138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कोई भाई है जिसकी बहन को कोई नाथ न हो। क्या कोई ऐसी बहन होगी जसे ऐसे दुर्भाग्य का सामना करना पड़े। मेरी उत्कट इच्छा है तू उसे पूरा कर, आ और मुझमें एकाकार हो जा।’’ यम अटल रहा और दो टूक उत्तर दिया, ‘‘मैं तुझसे कभी सहवास नहीं करूंगा। जो बहन से संसर्ग करता है, वह पापी कहलाता है। मेरे सिवाय किसी अन्य से देह-सुख प्राप्त कर। तेरे भाई का ऐसा करने का कोई विचार नहीं है।’’ यमी ने अंत में दुखी मन से कहा, ‘‘यम, तू बड़ा निर्बल हृदय है। तू मेरे मन की, मेरे मानस की स्थिति नहीं समझता। क्या तुझसे कोई नारी ऐसे लपटेगी, जैसे घोड़े से तंग लिपटता है, अथवा जैसे कसी वृक्ष से कोई लता लिपट जाती है।’’ ‘‘यम ने अंत में कहा, तू भी किसी अन्य पुरुष के साथ वैसे ही लिपट जा जैसे वृक्ष से लता लिपट जाती है। उसका प्रणय प्राप्त कर, वह भी तुझसे वैसे ही मिलन को आतुर हो, तक तू अतीव सुख पा।’’ यम ने उसका और भी शुभ चाहा, उसने कहाः
‘‘राक्षस हंता अग्नि हमारी प्रार्थना स्वीकार करे, दुरात्मा से त्राण दे, जो व्याधि के रूप में तेरे भ्रूण को आक्रांत कर सके, जो अंतःकाष्ठ की भांति तेरे गर्भाशय को निरस्त करे।’’
‘‘अग्नि देव हमारी अर्चना को स्वीकार करें, नरभक्षियों को नष्ट करें जो व्याधि के रूप में तेरे गर्भाशय पर दुष्प्रभाव डालते हैं, जो अंतःकाष्ठ की भांति तेरी कोख को रीती कर सकते है।’’
‘‘दुरात्मा से हमें त्राण दे, जो पुंसत्व का हरण करते हैं। गर्भ ठहरते ही उसे विस्थापित करते हैं, जो नवजात शिशु का हनन करना चाहते हैं।’’
‘‘हमें दुरात्मा से त्राण मिले जो तेरी जंघा को विलग करता है, जो पति-पत्नी के बीच बाधा बनता है, जो तेरी कोख में प्रविष्ट होता है। बीज-हरण करता है। हमें उस दुरात्मा से त्राण मिले, जो भ्राता, अथवा पति इतर प्रियतम के रूप में तुझ तक पहुंचता है और गर्भपात करना चाहता है।’’
‘‘हमें दुरात्मा से त्राण मिले जो तुझे नींद या अंधेरे में छल लेता है, तुझ तक आकर गर्भपात कर देता है।’’
वेदों में दो चीजें हैं, पहली यह कि उनमें ऋषियों की आशाएं और आकांक्षाएं समाविष्ट जैसा कि म्यूर ने कहा हैः
‘‘इस पूरी रचना का स्वरूप और इनसे प्राप्त प्रमाणों के अनुसार जिन परिस्थितियों में ये रचे गए, उनसे पता चलता है कि आदि कवियों के सहज रूप में व्यक्तिगत अभिलाषा और मनोभावों का प्रकटीकरण था जिन्होंने सर्वप्रथम इन्हें गाया था। इनमें आर्य ऋषियों ने अपने प्राचीन देवताओं की तरह-तरह से स्तुति गाई और उन्हें संतुष्ट