परिविष्ट-1
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होने का आह्वान किया। ऐसे अनेक वरदान मांगे, जिनकी मानव मात्र को लालसा होती है, जैसे स्वास्थ्य, सम्पदा, चिरायु, पशुधन, संतति, शत्रु-विजय, पाप-मुक्ति और शायद स्वर्ग सुख भी।’’
यही दृष्टिकोण निरुक्त के लेखक यास्क का भी है, जो कहते हैंः
(‘‘पूर्वोक्त खंड में चार प्रकार की ऋचाएं हैं) (क) जो देवता की अनुपस्थिति में संबोधित हैं, (ख) जिसमें उसको समक्ष जानकर संबोधन किया गया है, (ग) जिसमें आराधक को उपस्थित और आराध्य को अनुपस्थित माना गया है। वे अत्यधिक हैं। (घ) जबकि, जो स्वगत हैं, वे विरले ही हैं। ऐसा भी हुआ है कि देवता की प्रशंसा बिना वरदान की कामना के लिए की गई है। जैसे कि मंत्र (ऋग्वेद) 1.32 ‘‘मैं इन्द्र के शौर्य का वर्णन करता हूं।’’ आदि। फिर बिना स्तुति किए वरदान की कामना की गई है, जैसे ‘‘मैं अपने चक्षुओं से अच्छा देखूं, मेरा मुख कांतिमान हो और कानों से भली भांति सुनूं।’’ ऐसा अथर्ववेद (यजुर) और बलि सूत्रों में बार-बार कहा गया है। फिर इसमें हम शपथ और शाप भी पाते हैं। (ऋग्वेद 7.104,15) ‘‘यदि मैं यातुधान हूं तो आज ही मैं मर जाऊं’’ आदि। फिर हम पाते हैं कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों को दर्शाने वाले मंत्र (ऋग्वेद दस, 129,2) तब मृत्यु नहीं थी न अमरत्व आदि। कुछ परिस्थितियों में विलाप भी उपलब्ध है, जैसे कि मंत्र (ऋग्वेद दस, 95,14) ‘‘रूपवान देवता प्रस्थान करेगा और अब कभी नहीं लौटेगा आदि। कहीं लांछन और प्रशंसा है, जैसा कि (ऋग्वेद. दस, 117,6) ‘‘वह व्यक्ति जो अकेला खाता, अकेला पाप-कर्म करता है आदि’’। द्यूतक्रीड़ा के विषय में मंत्र है (ऋग्वेद. 10, 34,13) जिसमें द्यूतक्रीड़ा की निंदा की गई है और कृषि कार्य की प्रशंसा। इस प्रकार जिन उद्देश्यों से ऋचाओं की सृष्टि हुई, वे विविध प्रकार की हैं।’’
सूक्त 12 (155वां)
देव, राजयक्षमा का उपचार हैः ऋषि है कश्यपपुत्र विव्रीहन_ छंद अनुष्टुप है।
मैं तेरी आंखों, तेरे शीर्ष, तेरी नासिका, तेरे कर्ण, तेरी ठोड़ी, तेरी मानस, तेरी जिव्हा का रोगहरण करता हूँ।
मैं तेरी ग्रीवा, तेरी शिराओं, तेरी अस्थियों, तेरे संधिक्षेत्रों, तेरे बाहुओं, तेरे स्कंधों और तेरी कलाइयों का रोगहरण करता हूँ।
मैं तेरी अंतडि़यों, तेरी गुदा, तेरे उदर, तेरे वृषक, तेरे यकृत और तेरे अन्य अंगों का रोगहरण करता हूँ।
मैं तेरी जंघाओं, तेरे घुटनों, तेरी एडि़यों, तेरे पैर के पंजों, तेरी कटि, तेरे नितम्बों