परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 155

140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और तेरे गुप्तांगों का रोगहरण करता हूँ।

  1. मैं तेरे मूत्रमार्ग, तेरे मूत्राशय, तेरे बालों, तेरे नखों और तेरी पूरी देह का रोगहरण करता हूँ।

  2. मैं तेरे प्रत्येक अंग, प्रत्येक बाल, प्रत्येक जोड़, जहां भी वह उत्पन्न हो, तेरी पूरी देह का रोगहरण करता हूँ।

जैसा कि प्रोफेसर विल्सन समझते हैं, ऋग्वेद (सबसे विशाल ग्रंथ) में छलनी से मुश्किल से कोई ऐसा उदाहरण मिलेगा जिससे प्रकट होता हो कि उसमें कोई सैद्धांतिक अथवा दार्शनिक विवेचन है। उसमें विभिन्न परवर्ती सिद्धांतों का संकेत ही नहीं, उसमें पुनर्जन्म की ओर भी कोई इंगित नहीं है, न इससे संबद्ध किसी अन्य सिद्धांत का, न ही विश्व की बार-बार सृष्टि का। आर्यों के सामाजिक जीवन पर प्रकाश डालने के लिए वेदों में पर्याप्त सामग्री मिलती है। इसके लिए वे उपयोगी हो सकते हैं। यह आदिम जीवन का चित्रण है। उनमें प्रगति का कोई प्रसंग नहीं, उनमें दोष अधिकांश और गुण न्यूनतम है।

वेदों के सार और विषयवस्तु को देखते हुए यह आश्चर्यजनक है कि ब्राह्मण क्योंकर इस अंधविश्वास को संशय-रहित मानते हैं।

यदि मंत्र-सृष्टा ऋषि स्वयं दावा करते तो संशय-रहित होने के सिद्धांत का कोई औचित्य ठहराया जा सकता था। किन्तु यह स्पष्ट है कि ऋषियों ने ऐसा आडम्बर नहीं रचा। इसके विपरीत उन्होंने कई बार जिज्ञासा-स्वरूप अपनी अज्ञता को स्वीकार किया है। ऋग्वेद के निम्नांकित मंत्र उनकी भावना के प्रतीक हैंः

‘‘अज्ञ हूं, मेरे मानस (ज्ञान) से परे हैं, मैं देवताओं का अज्ञात आवास जानना चाहता हूं, ऋषि ने अपना जनेऊ बछड़े के खुर तक खींचा।’’ ¹6. अज्ञ (हूं) मैं उन ऋषियों से पूछता हूं जिन्हें इस विषय में ज्ञान है, अनजान (मैं पूछता हूं) कि मैं जानूं कि अजन्मों के रूप में क्या है जो इन छह लोकों को कैसे सँभालते हैं?ह् 37. मुझे पता नहीं कि मैं ऐसा हूं, मुझे आश्चर्य होता है कि मेरा ज्ञान सीमित है, जब बलि से प्राप्त प्रथम पुत्र (सत्य) मुझे प्राप्त हुआ, तब मैं उस शब्द का आनन्द लेता हूं।’’

‘‘वन क्या थे, वृक्ष क्या थे, उन्होंने जिससे स्वर्ग और पृथ्वी बनाई, जो अब तक अक्षय विद्यमान हैं, कितने दिन, कितने प्रातः बीत चुके हैं?’’

‘‘इन दोनों स्वर्ग और धरा में से कौन पहला है? कौन अंतिम है? ये कैसे उत्पन्न हुए? हे ऋषि, कौन जानता है?’’