परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 156

परिविष्ट-1

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‘‘कितनी अग्नियां हैं? कितने सूर्य हैं? कितने सवेरे हैं? कितने जल हैं? पिता, मैं तुमसे उपहास नहीं कर रहा हूं। मैं ऋषि सचमुच पूछ रहा हूं जिससे मैं जान सकूं।’’ 5. ‘‘वहां किरणें तिर्यंक फैलती हैं, यह नीची हैं अथवा ऊंची? वहां जनन शक्ति थी और महान शक्तियां थीं प्रयत्न स्वाध्याय नीचे है या ऊपर 6. कौन जानता है यह किसने बनाया है? यह सृष्टि कब हुई? कहां से आई? परमात्मा इस ब्रह्मांड की सृष्टि के पश्चात् जन्मा और कौन जानता है यह कब रची गई? क्या किसी ने इसकी रचना की? अथवा नहीं? जो सर्वोच्च स्वर्ग में रहता है, उसने यह ब्रह्मांड रचा। वह सचमुच जानता है अथवा नहीं?’’

इस अमोघता या संशयरहित सिद्धांत के बारे में कुछ अन्य बिंदु भी हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है।

IV

प्रथम प्रश्न यह है कि यह मान्यता मौलिक है अथवा भारत के इतिहास में कालातीत में जड़ दी गई। सामान्यतः यह मत प्रकट किया जाता है कि यह एक मूलभूत सिद्धांत है। सर्वप्रथम धर्मसूत्रों में इस विषय पर प्रकाश डाला गया है जो सर्वप्रथम विधिग्रंथ हैं। उनका संकेत है कि यह विकास सही नहीं है। वेदों की संशयहीनता के संबंध में गौतमधर्म सूत्र ने निम्नांकित नियम प्रतिपादत किए हैंः

‘‘वेद पवित्र विधान के उद्गम हैं’’ 1.1

‘‘और उनकी परम्पराएं तथा रीतियां जो (वेदों को) जानते हैं’’- 1.2

‘‘यदि समान (अधिकारों वाली) शक्तियों के बीच संघर्ष हो किसी एक का अनुसरण करें, सुखी रहें’’- 1.4

वशिष्ठ धर्म सूत्र का वचार इस प्रकार हैः

‘‘पवित्र विधान पाठों और ऋषि परम्पराओं से निर्धारित किए गए हैं’’- 1.4.

‘‘(नियमों के अनुसार) निश्चय न हो पाने पर इन (दो सूत्रों) शिष्टों की सत्ता सर्वोपरि है।’’- 1.5.

‘‘जो कामनारहित हैं शिष्ट (कहलाते हैं)- 1.6.

बौधायन का मत निम्न प्रकार हैः (प्र 1, अध्या 1 कंडिका 1)

  1. प्रत्येक वेद में पवित्र नियमों की शिक्षा है।

  2. हम उसके अनुसार व्याख्या करेंगे।