परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 157

142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

  1. (पवित्र विधान) की शिक्षा परम्पराओं में है। (स्मृति का दूसरा स्थान है।)

  2. शिष्टों के व्यवहार का तीसरा स्थान है।

  3. शिष्ट निःसंदेह (वे हैं) जो निस्पृह ‘ईर्ष्या से मुक्त’ दर्प से मुक्त, मात्र दस दिन के लिए अन्न-संग्रह से संतुष्ट होते हैं, लोभ से मुक्त, पाखण्ड, अज्ञान, स्वार्थ, अनिश्चय बुद्धि तथा क्रोध से रहित हैं।

  4. जो शिष्ट (कहलाते हैं) जिन्होंने पवित्र विधान के अनुसार वेद-वेदांग का अध्ययन किया है, जो जानते हैं कि इनसे किस प्रकार संदर्भ लिए जाएं, मान्य पाठ से भावानुकूल साक्ष्य प्रस्तुत कर सकें।’’

  5. उनके विफल हो जाने पर न्यूनतम दस सदस्यों की सभा (विधान के विवादित प्रश्नों पर निर्णय दें।)

  6. अब वे उद्धृत करते हैं (निम्नांकित मंत्र)ः ‘‘चार पुरुष, उनमें से प्रत्येक किसी वेद मीमांसा का ज्ञाता हो, वेदांग को जानता हो, जो पवित्र विधान का वाचन करें, एवं विभिन्न तीन सिद्धांतों के अनुयायी, तीन ब्राह्मणों की मिलकर एक सभा बनती है, जिसमें न्यूनतम दस सदस्य हों।’’

  7. इसमें पांच अथवा तीन अथवा एक निर्विवाद व्यक्ति हो सकता है जो (सम्बद्ध प्रश्न पर) पवित्र विधान के अनुकूल निर्णय करें। किन्तु एक हजार मूर्ख मिलकर भी निर्णय नहीं कर सकते।

  8. काष्ठ निर्मित हाथी, चमड़े से बना मृग, अशिक्षित ब्राह्मण इन तीनों में कुछ नहीं होता, ये दर्शनीय पदार्थ हैं।

आपस्तम्ब धर्म सूत्र द्वारा लिया गया दृष्टिकोण स्पष्ट है जो निम्न सूत्र से लिया गया हैः

‘‘हम सब बताएंगे कि गुणकर्म क्या है? जो दैनिक जीवन के व्यवहार का अंग बनते हैं।’’ 1.1.

‘‘इन अधिकारों (उपरोक्त कर्तव्य पालन के) को सहमति (समझौता) कहते है। जो विधि को समझते हैं’’। 1.2.

‘‘और (शीर्ष अधिकारी) मात्र वेद हैं।’’ 1.3.

धर्मसूत्रों का विवेचन प्रकट करता है कि वेदों की संशयहीनता की मान्यता एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। इससे प्रदर्शित होता है कि विवाद की बात पर इनमें से किसे संशय-रहित माना जाए? 1. वेद, 2. परंपरा (स्मृति), 3. शिष्टों के व्यवहार, 4. सभा