परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 158

परिविष्ट-1

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में समझौता_ ये चार अधिकार केन्द्र थे। यह समय वशिष्ठ और बौधायन के धर्मसूत्रों का काल था। गौतम के काल में ही वेदों की एकछत्र सत्ता स्थापित हुई। एक ऐसा समय भी था जब सभा का निर्णय सत्ता का केन्द्र था। यह बौधायन का युग था। अंत में विवेचन से यह भी प्रकट होता है कि एक ऐसा समय था जब वेदों को अधि कार संपन्न ग्रंथ नहीं माना जाता था, बल्कि सत्ता का केन्द्र विद्वानों की सभा का निर्णय हुआ करता था। यह काल था, जब आपस्तम्ब ख्1, ने अपने धर्मसूत्रों की रचना की अर्थात् ईसा से 600 से लेकर 200 वर्ष पूर्व ख्2, तक।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि वेदों को जानबूझकर सनातन बनाने का प्रयास किया गया। जिनको पहले ऐसा नहीं माना जाता था। अब प्रश्न यह है कि वे कौन-सी परिस्थितियां और क्या इरादे थे, जिनके अनुसार ब्राह्मणों ने यह प्रचारित किया कि वेद एकछत्र और परमसत्ता के केन्द्र हैं।

वेदों की सनातनता से दूसरा सम्बद्ध यह है कि ब्राह्मणों ने भेदभाव क्यों बरता और वेदों के कुछ अंशों तक ही संशयहीनता का सिद्धांत क्यों लागू किया? पूरे वैदिक साहित्य को इस श्रेणी में क्यों नहीं रखा? इस प्रश्न को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि वैदिक साहित्य का क्या अर्थ है? ‘‘वैदिक साहित्य’’ शब्द का प्रयोग दो अर्थों में है। उसके अंग हैं- (1) संहिता, (2) ब्राह्मण, (3) आरण्यक, (4) उपनिषद और (5) सूत्र। जब इसका विस्तृत अर्थ किया जाता है तो इसमें दो अंग और जुड़ जाते हैं। (6) इतिहास, और (7) पुराण।

पहली बात ध्यान में रखनी चाहिए कि एक समय था जब यह सारा साहित्य एक ही श्रेणी में आता था और इनके बीच उद्घाटित अथवा लौकिक, अलौकिक अथवा मानवीय, तथा प्राधिकृत अथवा अप्राधिकृत के आधार पर कोई भेद नहीं था। यह बात शतपथ ब्राह्मण से स्पष्ट है, जो कहता हैः

‘‘पुरुष प्रजापति की इच्छा हुई कि ‘‘मेरी अभिवृद्धि हो, मेरा विस्तार हो’’। वे समाधिस्थ हो गए, उन्होंने घोर तप किया। इस तप से उन्होंने त्रिदेव विज्ञान-प्रज्ञा की रचना की। यह उनका आधार बना। उन्होंने कहा- ‘प्रज्ञा ब्रह्मांड का मूल्य है’। वेदों के ज्ञान के पश्चात् पुरुष को आधार मिला कि प्रज्ञा उसका मूल है। इस आधार पर प्रजापति ने घोर तप किया। (9) उन्होंने वाच से जल कर रचना की। उसके विस्तरण से जल

  1. आपस्तम्ब धर्मसूत्र में वेदों के प्रसंग से भ्रम नहीं होना चाहिए। आपस्तम्ब वेदों की सत्ता स्वीकार नहीं करता। उसमें वेदों का ज्ञान परिषद की सदस्यता की अर्हता भर है जिसकी मान्यता ही वैध है।
  2. मैक्समूलर के अनुसार यह सूत्रों का युग है। आपस्तम्ब प्राचीनतम है।