परिशिष्ट-1: वेदों की पहेलियां - Page 159

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘‘अप्प’’ कहलाया। उसकी सर्वत्र व्यापकता से वह ‘‘वारि’’ बना। (10) उन्होंने चाहा, ‘‘मेरा जल से विस्तार हो’’। इस त्रिवेद विज्ञान से वे जल से प्रविष्ट हुए, तब एक अण्डज उभरा। उन्होंने उसे प्राणवान किया और कहा, ‘‘भव भव पुनर्भव’’। तब प्रज्ञा का जन्म हुआ। त्रिवेद विज्ञान। फिर पुरुष ने कहा, ‘प्रज्ञा ब्रह्मांड की प्रथम सृष्टि है।’ पुरुष के समक्ष सर्वप्रथम प्रज्ञा की रचना हुई। इसलिए यह उसका मुख बनी। इस प्रकार आगे वह कहते हैं ‘‘वह अग्नि के समान है क्योंकि प्रज्ञा अग्नि का मुख है।’’

‘‘आर्द्र काठ से उपजी अग्नि उससे उठे भिन्न-भिन्न धुंए। उनकी श्वास प्रक्रिया से महान ऋग्वेद बना, यजुर्वेद बना, सामवेद बना, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विज्ञान, उपनिषद, श्लोक, सूत्र विभिन्न प्रकार के भाष्य बने। यह सब उसका श्वास बने।’’

परन्तु जब ब्राह्मणों ने संशय-रहित होने के सिद्धांत को स्थापित करने का मन बनाया तो उन्होंने वैदिक सहित्य को दो भागों में विभक्त कर दिया। 1. श्रुति और 2. अश्रुति। प्रथम विभाजन में उन्होंने आठ अंगों में से केवल दो को श्रेष्ठ रखा। संहिता और ब्राह्मण, शेष को उन्होंने अश्रुति घोषित कर दिया। यह बताना संभव नहीं कि यह अंतर कब उत्पन्न हुआ परन्तु यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण है कि किस आधार पर यह भेद किया गया। आरण्यक और उपनिषद् क्यों छांट कर बाहर कर दिए गए? पहले समझा जा सकता है कि इतिहास और पुराणों को श्रुति से क्यों वंचित किया गया? जिस समय यह भेद किया गया, तब वे इतने आरम्भिक और अविकसित थे कि उन्हें शायद ब्राह्मणों में सम्मिलित कर लिया गया।

साथ ही यह बात भी समझ में आती है कि आरण्यकों का श्रुति के अंग के रूप में उल्लेख क्यों नहीं किया गया? ब्राह्मणों के अंग थे और शायद इसी कारण यह उल्लेख करना अनावश्यक था कि यह श्रुति का अंग है, उपनिषद और सूत्रों का प्रश्न एक पहेली ही बना हुआ है। इन्हें श्रुति से अलग क्यों रखा गया? परन्तु सूत्रों का मामला अलग है। वे श्रुति की श्रेणी से निश्चित रूप से विलग कर दिए गए जिसको समझना बुद्धि से परे है। यदि यह बात तर्कसम्मत है कि ब्राह्मणों को श्रुति में सम्मिलित किया जाना चाहिए, उसी कसौटी पर यह बात खरी नहीं उतरती कि सूत्रों को शामिल क्यों न किया जाए? जैसा कि प्रोफेसर मैक्समूलर कहते हैंः

‘‘हम इस बात को समझ सकते हैं कि किस प्रकार कोई देश अपनी राष्ट्रीय काव्य रचना का श्रेय किसी अलौकिक पुरुष को दे सकता है? विशेष रूप से तब, जबकि उस काव्य में देवों को सम्बोधित प्रार्थनाएं और मंत्र समाविष्ट हों। परन्तु ब्राह्मण ग्रंथों के गद्य-साहित्य के विषय में यह कहना कठिन है। ब्राह्मण ग्रंथ स्पष्ट रूप से मंत्रों की