परिविष्ट-1
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अपेक्षा बाद की रचनायें हैं। इसी कारण इन्हें श्रुति में समाहित किया गया होगा कि इनकी सामग्री ब्रह्मज्ञान युक्त है। ब्राह्मण-ग्रंथों के अधिकांश दावों के बारे में यह कल्पना की गई होगी क इसकी रचना दैवी है, जिनका उद्गम सामान्य पद्य अथवा मंत्र नहीं हो सकते। किन्तु हमें इस तर्क को मान्यता देने की आवश्यकता नहीं, जिसके कारण ब्राह्मण-ग्रंथों ने अपने को मंत्र-रचना के समकालीन माना है। इसका कोई कारण समझ में नहीं आता कि ब्राह्मण-ग्रंथों और मंत्रों का रचनाकाल अधिक प्राचीन है। तो हम इस सहज विचार को क्यों अस्वीकार कर दें कि यदि सूत्रों और भारत के लौकिक साहित्य की तुलना की जाए तो उनका महत्व समान बनता है। ऐसी घटना सामान्य है जहां पवित्र ग्रंथों का यह नियम है कि बाद की रचनाओं को प्राचीन रचनाओं से जोड़ दिया जाता है, जैसा कि ब्राह्मण-ग्रंथों के साथ हुआ। किन्तु हम कठिनाई से ही यह कल्पना कर सकते हैं, जब तक कोई पक्ष इन तिरस्कृत रचनाओं के सिद्धांत विशेष की प्रामाणिकता अमान्य घोषित करने के लिए प्रयत्नशील न हो, पुराने अंशों को पवित्र रचनाओं से हटा दिया जाए और उन्हें बाद की रचनाएं बना दिया जाए। सूत्रों के परवर्ती साहित्य में ऐसा कुछ नहीं है। ऐसी कल्पना का कोई आधार नहीं है। हमें ब्राह्मण और मंत्रों की अपेक्षा उनके परवर्ती होने के सिवाय ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि सूत्रों को श्रुति न बनाया जाए। क्या ब्राह्मण ग्रंथकारों को स्वयं ज्ञात था कि ऋषियों की अधिकांश रचनाओं और ब्राह्मण ग्रंथों के उद्भव तक युगों बीत चुके थे? इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक है, किन्तु जिस दुस्साहस के साथ भारत के ब्रह्मज्ञानियों ने ब्राह्मण-ग्रंथों को वही पद और मंत्रों के समान उनका काल-निर्धारण किया, उससे यह प्रकट होता है कि इसका कोई विशिष्ट कारण रहा होगा कि सूत्रों को उतनी ही पावनता और प्रामाणिकता न दी जाए।’’
तीसरा प्रश्न उन परिवर्तनों से संबद्ध है जिसके अनुसार श्रुति और उनकी संशयहीनता की श्रेणी निर्धारित हुई। मनु ने ‘ब्राह्मणों’ को श्रुति की श्रेणी से अलग ख्1, कर दिया जैसा कि उसकी स्मृति से स्पष्ट हैः
‘‘श्रुति का अर्थ है, वेद और स्मृति का अर्थ है विधान, इनकी विषय-सामग्री पर तर्क नहीं किया जा सकता क्योंकि इनमें कर्त्तव्य-बोध है। वे ब्राह्मण, जो बुद्धिवादी लेखों पर आधारित हैं, वे ज्ञान के इन दो स्रोतों की निंदा करेंगे, उन्हें संशयवादी और निंदक जानकर बहिष्कृत किया जाए। जो कर्त्तव्य-बोध चाहते हैं, उनके लिए श्रुति
- इसमें विवाद हो सकता है कि वेद में ब्राह्मण को सम्मिलित किया गया है, जो तथ्य भी है। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मनु ने स्मृति का प्रयोग प्रतिबंधित रूप में किया, जिससे कि ब्राह्मण बाहर रहा। इसे इस तथ्य से भी बल मिलता है जैसा कि मनुस्मृति में ब्राह्मण का कोई संदर्भ नहीं है सिवाय एक स्थान पर (4.100) जहां वह कहता है कि केवल मंत्र के भाग के अध्ययन की जरूरत है।