परिशिष्ट-3: त्रिमूर्ति की पहेली - Page 175

160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(7-99.7_ 7-100.5-6) और जान -बूझकर इस शब्द का अर्थ दुर्बोध सा रखना ही इसका उद्देश्य है। वैदिक मंत्र-दृष्टाओं ने जानबूझ कर विष्णु के स्वाभाविक संदर्भ में बड़ी चतुराई से छिपाकर ‘सिपिविष्त’ शब्द का प्रयोग किया है। इस शब्द की व्याख्या के लिए अनेक प्रयास किए गए। परन्तु कुछेक ने ही दार्शनिक पक्ष संतुष्ट करने का प्रयत्न किया, लेकिन विष्णु के सही चरित्र का वर्णन नहीं हुआ। भाषाशास्त्र की दृष्टि से ‘‘सेप’’ शब्द (लिंग) को ‘‘सिपि’’ से अलग नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार ‘सिप’ शब्द जिसकी मूल धातु प्राकृत ‘क्षेप’, लैटिन ओइपपुस, सैपियो आदि मिलता है। यहां तक कि निरुक्त (5-7) में भी संकेत से इस विचार की पुष्टि होती है। यद्यपि इसकी असली व्याख्या स्पष्ट नहीं है। इसी के साथ इस शब्द का मूल यह आभास देता है कि पूरे शब्द का अर्थ है ‘‘परिवर्तनशील लिंग, फूला हुआ और सिकुड़ता हुआ लिंग’’। अब हम सहज ही समझ सकते हैं कि वैदिक मंत्र-दृष्टाओं ने विष्णु के संदर्भ में छिपाते हुए और घुमा-फिरा कर इस शब्द की व्याख्या की है। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है जो निरुक्त (5-8,9) में विष्णु के नाम के बारे में प्रयुक्त किया है। विष्णु के संबंध में वैदिक साहित्य में ऐसे ही और भी प्रसंग हैं जिनमें उनकी सृजनशीलता, उत्पादन-क्षमता और स्वजीवन का अन्तर्बोध होता है।

वैदिक श्राद्ध में एक और अस्पष्ट-सी क्रिया है और वह है अंगुष्ठ। बिना नाखून का अंगूठा पितरों को चढ़ाई जाने वाली सामग्री में डुबोया जाता है। यह क्रिया विष्णु के नाम पर की जाती है। अंगुष्ठ निःसंदेह लिंग का द्योतक है। इस प्रकार विष्णु इस क्रिया में, वैदिक कर्मकाण्ड में लिंग से संबद्ध हैं। बाद के साहित्य में अंगुष्ठ विष्णु की पहचान है। इस बारे में हमें एक और साक्ष्य मिलता है आई.एस. (6.2. 4.2)। धरतीमाता के गर्भ में विष्णु का प्रवेश गर्भाधान संस्कार का सांकेतिक वर्णन है। ‘‘तनवर्धनः’’ विष्णु के संदर्भ में प्रयुक्त होता है (7-99.1ः8-100.2)। इसे भी लिंग प्रवृत्ति में गिना जा सकता है। परवर्ती साहित्य में विष्णु को हिरण्यगर्भ और नारायण कहा गया है। विष्णु के व्यक्तित्व पर सिनीवली (अ.वे. 7-46, 3) भी उल्लेखनीय है। ‘विस्तीर्ण नितम्बा’ नारी रति-क्रिया को सुखद बनाने वाले विष्णु के चरित्र पर प्रकाश डालती है। सांख्यायन के गृह्यसूत्र (1.22.13) के मंत्र (10. 184.1) के अनुसार वह गर्भधारण संस्कार में सहभागी होता है। इससे पता चलता है कि विष्णु भ्रूण का अमोघ संरक्षक है। अ.वे. (7.17.4) के अनुसार विष्णु का रतिक्रिया से प्रत्यक्ष संबंध है, विष्णु के दो विशेषण, विष्णु निसिकाय (7.36.9) वीर्य संरक्षक और ‘‘सुमज्जनी (1 156.2) सहज प्रसूति स्वयं में इसके प्रमाण हैं। शब्द पौरुषेय विष्णु के लिए प्रयुक्त हुआ है। ऋ. वे. (ई 155.3-4) वृषकपि मंत्रों (10.86) में कहा गया है कि इन्द्र क्लांत हो गए। तब एक सुगठित शरीर कामुक