परिशिष्ट-3: त्रिमूर्ति की पहेली - Page 181

166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

महिमा-मण्डन के लिए एक देव के भक्तों ने जिस प्रकार पक्ष में प्रचार किया, उसके उत्तर में दूसरों ने भी अपने पक्ष में वैसा ही प्रतिप्रचार किया। गंगावतरण ख्1, का प्रसंग एक उदाहरण है। शिव-भक्त उसकी उत्पत्ति शिव की जटाओं से मानते हैं, परन्तु वैष्णव इसे मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने एक और कथा गढ़ डाली। वैष्णवों के आख्यान के अनुसार पतित-पावनी गंगा बैकुंठ (विष्णु के निवास) से निकलती है। उसका उद्गम विष्णु के चरणों से है और कैलाश पर आकर वह शिव के मस्तक पर उतरती है। इस कथा के दो निष्कर्ष हैं। प्रथम यह कि गंगा का उद्गम विष्णु के चरणों से है, शिव की जटा से नहीं। फिर, शिव का पद विष्णु से नीचा है क्योंकि उनके मस्तक पर गंगा की धार विष्णु के चरणों से गिरती है।

दूसरा उदाहरण देखें जो देवों और असुरों द्वारा सागर-मंथन का है। उन्होंने मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया और शेषनाग को रस्सी (रज्जू)। विष्णु ने कूर्म अवतार लिया और पृथ्वी को अपनी पीठ पर धारण किया तथा मंथन के समय उसके स्पंदन को नियंत्रित किया। यह कथा विष्णु की महिमा बढ़ाने के लिए रची गई। शिव का स्थान, इसमें गौण है। इसके अनुसार समुद्र-मंथन से चौदह रत्न निकले। इनमें से हलाहल एक था। यदि कोई इस हलाहल का पान न करता, वह समस्त विश्व को नष्ट कर सकता था। शिव ही उसके पान के लिए तत्पर हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि विष्णु द्वारा दोनों विरोधी समूहों, देव और असुरों का सागर मंथन की अनुमति देकर विश्व के विनाश का द्वारा खोल दिया गया था और उन्होंने अविवेकपूर्ण कार्य किया था। शिव की महिमा बताई गई है कि उन्होंने विष-पान करके विष्णु की करतूत से होने वाले अनिष्ट से विश्व को बचा लिया।

तीसरा उदाहरण भी यह प्रकट करता है कि विष्णु मूर्ख थे और शिव ने ही अपनी विलक्षण बुद्धिमत्ता और पराक्रम से विष्णु को उनकी करनी से त्राण दिलाया। यह कथा अक्रूरासुर ख्2, की है। अक्रूर ऋक्ष के मुख वाला एक राक्षस था। इसके बावजूद वह नियमित रूप से वेद पाठ करता था और भक्ति कर्म करता था। विष्णु उससे अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसे मनचाहा वरदान देने का वचन देने को मान गए। अक्रूरासुर ने वर मांगा कि त्रैलोक्य का कोई भी प्राणी उससे अधिक बलशाली न हो, न उसे मार सके। विष्णु ने उसे वरदान दे दिया। परन्तु वह इतना ढीठ हो गया कि जब उसने देवताओं को त्रास दिया तो वे छिप गए और वह विश्व का शासक बन बैठा। असुर के अत्याचारों से लाचार विष्णु काली तट पर चिंतित बैठे थे। उनका रोष स्पष्ट दिख रहा था। उनकी आंखों के सामने ऐसे आकार जीव प्रकट हुआ जो पहले त्रिलोक में विद्यमान नहीं था। वह रौद्र रूपी महादेव थे, जिन्होंने क्षण भर में

  1. मूर, हिंदू पेनथियन, पृ. 40-41

  2. यह कहानी विष्णु आगम में कही जाती है और मूर के हिंदू पेनथियन पृ, 19-20 में उल्लिखित है।