परिशिष्ट-3: त्रिमूर्ति की पहेली - Page 182

परिशिष्ट-3

विष्णु को त्राण दिलाया।

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इसके जवाब में भस्मासुर की कथा प्रचलित हुई जिसमें शिव को मूर्ख बताया गया है और विष्णु उस के परित्राण कर्त्ता दिखाए गए हैं। भस्मासुर ने शिव को एक वरदान के लिए प्रसन्न कर लिया। वरदान यह था कि भस्मासुर जिसके भी सिर पर हाथ फिराएगा, वह भस्म हो जाएगा। शिव ने वरदान दे दिया। भस्मासुर ने शिव के वरदान से उन्हें ही भस्म करने की ठानी। शिव भयभीत होकर भागे और विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और भस्मासुर के पास गए। वह उन्हें देखकर आसक्त हो गया। मोहिनी रूपी विष्णु ने कहा कि वह एक शर्त पर उसकी हो जाएगी, जैसे-जैसे वह क्रिया करे, वैसे ही भस्मासुर अनुसरण करे। विष्णु ने इस प्रकार भस्मासुर का हाथ उसके सिर पर रखवा दिया। परिणाम यह निकला कि भस्मासुर का काम तमाम हो गया और विष्णु को यह श्रेय मिला कि उन्होंने शिव को उनकी भूल के संभावित विनाश से बचा लिया।

इन देवताओं के बीच इस प्रश्न पर प्रतिस्पर्धा और शत्रुता का ज्वलंत प्रमाण मिलता है कि पहले कौन जन्मा? एक कथा स्कंद पुराण में आती है। स्कंद पुराण कहता है कि विष्णु देवी के वक्षस्थल पर सो रहे थे। उनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ और वह पुष्प जल की सतह पर आ गिया। उसमें से ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने जब यह देखा कि इस अनन्त में कोई जीव नहीं है तो उन्होंने सोचा सर्वप्रथम वे ही उत्पन्न हुए हैं और इस प्रकार उन्होंने स्वयं को भावी सृष्टि से पूर्व-जन्मा बताया। फिर भी यह विश्वास करने के लिए कि उनकी प्रभुसत्ता को चुनौती कौन दे सकता है, उन्होंने कमल-नाल को खींचा तो विष्णु को सोता हुआ पाया। उन्होंने जोर से पूछा तू कौन है।’ विष्णु ने कहा, मैं प्रथम जन्मा हूं और जब ब्रह्मा ने अपने को पूर्व जन्मा बताया तो दोनों में युद्ध छिड़ गया। तभी महेश प्रकट हुए और कहा पहले मेरा जन्म हुआ। परन्तु मैं तुम दोनों में से किसी के भी लिए यह स्थिति त्यागने के लिए तैयार हूं, जो मेरी शिखा तक पहुंचे अथवा मेरे पांवों के तल तक। ब्रह्मा तुरन्त तैयार हो गए किन्तु वे थक गए थे पर बिना बात के प्रयत्न के अनिच्छुक हो गए। इसलिए उन्होंने अपना इरादा त्याग दिया। वे महादेव की ओर मुड़े और कहा, ‘उन्होंने अपनी बात पूरी कर दी है और उनके माथे का मुकुट देख लिया है और साक्षी के लिए प्रथम जन्मी गाय को बुला लिया। इस गर्व और झूठ पर शिव को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा कि ब्रह्मा की कोई पूजा नहीं होगी और गाय मुख विकृत हो जाएगा।’ फिर विष्णु आए। उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे शिव के चरण तल नहीं देख पाए। तब उन्होंने उनसे कहा कि देवों में वही प्रथम जन्मे हैं और उनका पद सर्वोच्च है। इसके पश्चात् शिव ने ब्रह्मा का पांचवा मुख काट डाला और इस प्रकार उनका मान भंग हुआ। उनकी शक्ति और प्रभाव क्षीण हो गए।