168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस कथा के अनुसार ब्रह्मा का यह दावा झूठा था कि उनका जन्म सर्वप्रथम हुआ है। इसके लिए वे शिव के दण्ड के भागी बने। विष्णु को प्रथम जन्मा कहलाने का अधिकार मिला। ब्रह्मा के अनुयायियों ने शिव की सहायता के लिए विष्णु द्वारा ब्रह्मा का स्थान छीन लेने पर बदला लेने की ठानी। इसलिए उन्होंने एक और कथा ख्1, रच डाली। जिसके अनुसार, विष्णु ब्रह्मा के नथुनों से सूकर में उत्पन्न हुए और स्वाभाविक रूप से वाराह बन गए। विष्णु के वाराह-अवतार का यह बहुत क्षुद्र विश्लेषण है।
देवताओं के बीच खींचतान ने वही रूप ले लिया जैसे व्यापारियों में प्रतिस्पर्धा पनप जाती है। इसका परिणाम यह निकला कि शैव वैष्णवों और वैष्णव शैवों को गरियाने लगे।
यह तथ्य त्रिदेवों के विषय में है जिसका परवर्ती इतिहास में जिक्र है कि त्रिदेव की अवधारणा कोई नवीन नहीं थी। यह यास्क से प्राचीन है। अनगिनत देवताओं की संख्या घटाने के उद्देश्य से प्राचीन ब्राह्मणों ने कुछ देवताओं की जड़ काटने का मार्ग अपनाया और शेष से श्रेष्ठ बताने की चेष्टा की। इन प्रमुख देवताओं की संख्या तीन निश्चित की गई। इनमें से दो अग्नि और सूर्य थे। तीसरे स्थान के लिए इन्द्र और वायु में प्रतिस्पर्धा थी। परिणामस्वरूप एक त्रिमूर्ति बनी जिसमें अग्नि, इन्द्र और सूर्य थे अथवा अग्नि, वायु और सूर्य थे। नई त्रिमूर्ति की अवधारणा से प्राचीन अवधारणा के ही समान थी किन्तु उसके देवता बदल गए। इस त्रिमूर्ति का प्रत्येक देवता नवीन था। ऐसा लगता है प्रथम त्रिमूर्ति के विलुप्त हो जाने के काफी बाद तक किसी नई परम्परा का अस्तित्व नहीं था। चुल्ल निदेश में केवल ब्रह्म-वृत्तिका का उल्लेख है। शिव वृत्तिका तथा विष्णु वृत्तिका का कोई चिह्न नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि चुल्ल निदेश के समय तक शिव और विष्णु की पूजा शुरू नहीं हुई थी। ब्रह्मा के पश्चात् इन्हें उनके साथ जोड़कर त्रिमूर्ति बना दी गई। हमारे मानस में ब्राह्मणों द्वारा त्रिमूर्ति-रचना में निभाई गई भूमिका के विषय में अनेक प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
पहला प्रश्न यह है कि ब्राह्मणों को अपने देवताओं पर कितनी आस्था है? उन्होंने कितने सरल ढंग से अपने देवताओं के एक समूह को दूसरे के लिए तिरस्कृत कर दिया? इस संबंध में यहूदी पुजारियों और ‘नेबूचादनेज्जार’ की याद आती हैः
- ‘‘नेबूचादनेज्जार ख्1, राजा ने एक स्वर्ण मूर्ति बनवाई, जिसकी ऊंचाई साठ हाथ
और चौड़ाई छह हाथ की थी। उसने उसे बेबीलोन के मैदान दुरा में स्थापित
कराया।
- तब नेबूचादनेज्जार ने प्रान्तों के सभी क्षत्रपों, शासकों, न्यायाधीशों, कोषाधिपतियों,
अमात्यों आदि को बुलाया कि वे मूर्ति के समर्पण के समय उपस्थित हों।
- ओल्ड टैस्टामैंट - डोनियाल, अध्याय 3, पद्य 1-23