परिशिष्ट - 4
स्मार्त धर्म तथा तांत्रिक धर्म
II - स्मार्त धर्म
स्मृत-धर्म के पवित्र साहित्य में स्मृतियां अथवा संहिताएं आदि समाविष्ट हैं। ये स्मृतियां भारत की विधि-विधान हैं। इस विधि-विधान की परिधि इतनी व्यापक हो गई कि उसमें विधि, सरकार, समाज, विभिन्न जातियों के नागरिकों के अधिकार और कर्त्तव्य, पापों का प्रायश्चित और अपराधों के लिए दंड-व्यवस्था का प्रावधान है। इसके शुरू के निरपेक्ष अंशों पर हम इस समय अध्ययन नहीं कर रहे हैं। इसके उसी भाग के अंश प्रासंगिक हैं जो पूर्णतः धार्मिक हैं।
स्मृत-धर्म अर्थात् स्मृतियों पर आधारित धर्म पांच सिद्धांतों पर आधारित है। इसका प्रथम सिद्धांत है, त्रिदेव में आस्था, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश सम्मिलित हैं। इस त्रिमूर्ति में ब्रह्मा जगत का सृष्टा है, विष्णु पालनहार और शिव संहारक हैं। श्रुत-धर्म के तैंतीस देवताओं के स्थान पर स्मृत-धर्म तीन देवों तक सीमित हैं।
स्मृत-धर्म का दूसरा सिद्धांत है संस्कार। स्मृत-धर्म के अनुसार प्रत्येक गृहस्थ को कुछ संस्कार करने होते हैं। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो पतित हो जाता है, गरिमा से च्युत हो जाता है......
पौराणिक धर्म में दंड एवं प्रायश्चित का महत्वपूर्ण स्थान है। श्रुत धर्म में यम दुरात्माओं को और दंड नहीं देता। जीवन में किए गए पाप का दंड मृत्यु के पश्चात् भोगना पड़ता है अथवा नहीं, यह ज्ञात नहीं है परन्तु इस संबंध में पुराणों ने यम की शक्ति का बहुत विस्तार कर दिया है।
(मूल अंग्रेजी में उपरोक्त सामग्री टाइप किए हुए 21 पृष्ठ में है। आगे के पृष्ठ
‘स्मार्त-धर्म और तांत्रिक धर्म’ पर अंग्रेजी में कुछ पृष्ठ मिले थे। स्मृत-धर्म, खंड-2 और तांत्रिक धर्म, खंड-3 में प्रस्तुत किया गया है। खंड 1 में श्रुत धर्म पर सामग्री थी। स्मृत धर्म पर मात्र एक पृष्ठ की सामग्री भी पृ. 21 पर है। अंग्रेजी में तांत्रिक धर्म 55वें पृष्ठ से प्रारम्भ होता है और पृष्ठ 56 को छोड़कर 65 तक चलता है। लेखक ने हाथ से लिखे तीन पृष्ठ और जोड़े हैं। - संपादक