172 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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‘‘यम मृतकों का न्याय करता है। वह नरक का स्वामी है। जो मरता है, उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। फिर उसका सामना पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले चित्रगुप्त से होता है। पुण्यात्मा स्वर्ग अथवा एलीसियम को भेज दी जाती है जबकि पापात्माओं को नरक अथवा तरतारस में डाल दिया जाता है।’’
‘‘भयानक चित्रगुप्त की गर्जना प्रलयंकारी बादलों की गरज के समान है, वह काजल के चमकते पर्वत के समान है। शस्त्रों की चमक के समान आतंकोत्पादक है, उसकी बत्तीस भुजाएं हैं, जो तीन योजन लंबी है, लाल-लाल आंखें हैं, लंबी नाक है, उसके नुकीले और लंबे-लंबे दांत हैं, उसकी आंखें दीर्घ पोखर के समान हैं। उसके भंडार में काल और व्याधियों की भरमार है।’’
पाप का दंड मृत्योपरांत भोगना पड़ेगा। इसी प्रकार पापमुक्ति के लिए निश्चित प्रायश्चित का विधान है।
परन्तु पाप क्या है? पौराणिक धर्म के अनुसार, इसका अर्थ नैतिक दुराचार नहीं है, इसका अर्थ है पौराणिक विधि-विधान का पालन न करना। यह है पौराणिक धर्म।
III - तांत्रिक धर्म
तांत्रिक धर्म शक्ति की पूजा कर केन्द्रित है। शक्ति का शाब्दिक अर्थ है, ऊर्जा किन्तु तंत्रवाद में इसका तात्पर्य है पुरुषदेवता की सहगामिनी नारी। तांत्रिक धर्म का विशाल साहित्य है और हिंदुओं के धार्मिक साहित्य की अलग शाखा है। यह समझना आवश्यक है कि हिंदुओं के शाक्त मत में अपने व्यापक पौराणिक चरित्र मौजूद हैं। अनेक नारी देवियां हैं, जिनका हिंदू देवकुल में विशिष्ट स्थान है।
मूलरूप से तांत्रिक धर्म पौराणिक धर्म का विस्तार है। पुराणों में ही प्रथम बार अविवाहित नारी देवियों को मान्यता मिली। फिर विवाहित देवियों की मान्यता हुई, जो देव-पत्नियां थीं। इसका आधार यही है कि देवताओं की पत्नियों की देवी-रूप में पूजा की जाए। इसी कारण पुराणों ने शक्तिमत चलाया। पुराणों के अनुसार कोई देवता चाहे अकेला हो, उसका दोहरा चरित्र है। उनका एक रूप प्रशांत है और दूसरा विकराल। क्रियाशील रूप शक्ति कहलाता है। पुराणों में देवताओं की शक्ति का मानवीकरण देव पत्नी के रूप में किया गया है। यही शक्ति-मत (शाक्तमत) का आधार है अर्थात् किसी देवपत्नी की आराधना।