174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संक्षेप में, शाक्तों की सभी देवियां अथवा शक्तियां शव की नारी-शक्ति में समा हित हो जाती हैं। उनकी संख्या अगणित हो जाती है और उनके भिन्न-भिन्न रूप उभर आते हैं।
परन्तु यह पूजा एक साधारण बात बन गई। शिव के साथ दुर्गा, विष्णु के साथ लक्ष्मी, कृष्ण के साथ राधा, राम के साथ सीता की उपासना आरम्भ हो गई। शक्तियों की संख्या निश्चित नहीं की गई है।
किसी समय केवल आठ शक्तियां गिनी जाती थी, किसी समय नौ। जैसे, वैष्णवी, ब्राह्मणी, रौद्री, माहेश्वरी, नरसिंही, वाराही, इन्द्राणी, कार्तिकी और प्रधाना। लक्ष्मी के अतिरिक्त विष्णु की पचास शक्तियां और गिनी जाती हैं, शिव अथवा रुद्र की दुर्गा अर्थात् गौरी सहित पचास ओर शक्तियां हैं। सरस्वती, विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा की शक्ति हैं। वायु पुराण के अनुसार शिव की नारी प्रवृति के दो रूप हैं, आधी असित (अश्वेत) और आधी सित (श्वेत), इनमें से प्रत्येक का विस्तार हो गया। श्वेत और शांत स्वभाव की देवियों में उमा, गौरी, लक्ष्मी, सरस्वती आदि सम्मिलित हैं ओर अश्वेतों तथा विकराल देवियों में दुर्गा, काली, चण्डी और चामुण्डा आदि शामिल हैं।
बहरहाल, शीघ्र ही सारी शक्तियों का लोक प्रचार हो गया। इसके परिणामस्वरूप उनके अनगिनत स्वरूप और रूप उभर आए।
इस मानवीकरण का आधार विष्णु के अवतार थे जिसमें दैवी-प्रभाव की मात्रा के अनुसार वर्गीकरण हुआ जैसे पूर्णशक्ति, अंशरूपिणी, काल रूपिणी कालांश रुपिणी। इसकी अंतिम श्रेणी में ब्राह्मण से लेकर नीचे तक की जातियों की साधारण स्त्री भी सम्मिलित कर ली गइंर्। जिन्हें यह समझकर पूजा जाने लगा कि इन पर देवी आती है। यह नहीं भूलना चाहिए शाक्त मतावलंबियों की दृष्टि से प्रत्येक स्त्री साक्षात देवी है।
फिर भी अधिक प्रचलित वर्गीकरण महाविद्याओं के रूप में प्रारंभ हुआ। विष्णु के दस अवतारों की तरह इनकी संख्या भी दस ही रखी गई है। यह महाविद्याएं कहलाती हैं और देवी की महान विद्याओं का स्रोत हैं। इनके विभिन्न गुण हैं। इसी प्रकार इनका नामकरण किया गया है। 1. काली (श्यामा) कृष्ण वर्ण विकराल और प्रचण्ड स्वभाव, 2. तारा, सौम्य स्वरूप, विशेष रूप से कश्मीर में पूजी जाती है। 3. षोड्शी, सोलह वर्ष की सुंदर कन्या (त्रिपुरा भी कहलाती है जो मालाबार में पूजी जाती है)। 4. भुवनेश्वरी, 5. भैरवी 6. छिन्नमस्तका निर्वस्त्र देवी, हाथ में रक्त रंजित
खड्ग दूसरे हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर जो अपने ही शीशहीन धड़ से उबलते रक्त का पान करती ह,ै 7. धूमवती, धुएं के रूप में, 8. बगुला, बकमुखी, 9. मातंगी, भंगी जाति की स्त्री, 10. कमलात्मिका। इनमें से प्रथम दो विशेष रूप से महाविद्याएं हैं। अगली पांच विद्याएं हैं और शेष तीन सिद्ध विद्याएं हैं।