परिशिष्ट-4
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देवियों का अगला मानवीकरण अथवा स्वरूप मातृ अथवा मातृका अथवा महामातृ कहलाता है। भारत के कृषक वर्ग में प्रत्येक पंथ में उपासनीय मातृदेवी से महाविद्याओं के संबंध अधिक महत्वपूर्ण हैं। इस पर अगले अध्याय में और विस्तारपूर्वक विचार किया जाएगा।
मातृ इस प्रकार है- 1. वैष्णवी, 2. ब्राह्मी अथवा ब्राह्मणी। प्रायः ब्रह्मा की भांति चतुर्मुखी होती है। 3. कार्तिकेयी कभी-कभी मयूरी कहलाती है, 4. इन्द्राणी, 5. यमी, 6. वाराही, विष्णु के वाराह अवतार से सम्बद्ध, 7. देवी अथवा इंसानी, शिव भार्या के रूप में एक हाथ में त्रिशूल धारी, 8. लक्ष्मी। इनमें से प्रत्येक देवी माता की गोद में एक बच्चा है।
माताओं से घनिष्ठ संबंधित आठ नायिकाओं का भी मानवीकरण किया गया है। इनका माता होना आवश्यक नहीं। इनकी कल्पना केवल अवैध संभोग के संबंध में की गई है। इनके नाम हैं, बालिनी, कामेश्वरी, विमला, अरुणा, मेदिनी, जयनी, सर्वेश्वरी तथा कौलेसी।
दूसरा रूप है योगिनियों का। ये आठ पिशाचिनियां हैं, जो दुर्गा की सेवा के लिए बनाई गई हैं। कभी-कभी उस देवी का रूप भी धारण कर लेती हैं। इनकी संख्या साठ अथवा चौंसठ हैं और ये एक करोड़ तक हो सकती हैं।
एक अन्य नगण्य-सा वर्ग है डाकिनी और साकिनी। ये साधारणतः प्रेमिकाएं अथवा अति घृणित प्रवृतियों वाली राक्षसियां हैं और देवियों के समक्ष इनका रूप चंचल भृत्या के समान है, जो हर समय इनकी सेवा में रहती हैं।
परन्तु इनका प्रचण्डतम रूप काली है जिसकी कलकत्ता में पूजा होती है।
काली के स्वरूप के संबंध में तांत्रिकों के दो परिच्छेदों का रूपांतरण इस प्रकार हैः
फ्मद्य और नैवेद्य से पूजा की जानी चाहिए उस काली की जिसका मुख भयानक रूप से खुला हुआ है, बाल बिखरे हुए हैं, जो चतुर्भुजा है, उसने उन महाबलियों की मुंडमाला पहन रखी है जिनका उन्होंने संहार किया है और रक्तपान किया है। उनके करकमलों में खडग है जो निर्भीक है और वरदान देती है। जो विशाल मेघ के समान काली है और आकाश ही उसके वस्त्र हैं। उन्होंने नरमुण्ड माला धारण की है। उसी में रक्त की बूंद टपकाती हुई एक गर्दन है। दो शवों के कुण्डल पहने है। उनके हाथों में दो शव हैं, जिनके लंबे-लंबे दांत और मुस्कराता चेहरा है, जिनका रूप विरूप है, जो श्मशानवासिनी है। (लाशें खाती है) जो अपने पति महादेव की छाती पर खड़ी है।य्