परिशिष्ट-4: स्मार्त धर्म तथा तांत्रिक धर्म - Page 191

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(अंग्रेजी पांडु लिनपि के पृष्ठ संख्या 63-64 अप्राप्य हैं। 65 वें पृष्ठ की सामग्री नीचे दी जा रही है जिसका अंतिम पैरा लेखक की हस्तलिपि में है।)

तांत्रिक पूजा ऋतु अथवा पौराणिक पूजा से बिलकुल भिन्न है। इसका मूल दर्शन जो उपासना का सर्वोत्तम रूप है वह यह है कि मनुष्य की स्त्री के साथ मैथुन इच्­ छाओं की पूर्ण रूपेण संतुष्टि होनी चाहिए। तांत्रिक पूजा में पंच मकार की प्रधानता है। पंचमकार निम्न प्रकार हैंः

  1. मद्यपान, 2. मांस भक्षण, 3. मत्स्य सेवन, 4. मुद्रा सेवन, और 5. मैथुन।

तांत्रिक पूजा में भी ये क्रियाएं सम्पन्न की जाती हैं। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि जो निषेध हैं, तंत्र में वे भी मान्य हैं, बल्कि तंत्र पूजा में स्त्री से मैथुन पूजा का एक अंश है। हिन्दू धर्म का इस तरह का विकास है। इस इतिहास को पढ़कर सच्चे धर्म का विद्वान यह पूछने के लिए अवश्य बाध्य हो जाएगा फ्हिन्दू धर्म में नैतिकता का क्या स्थान है।य्

धर्म, निःसन्देह रूप से कई प्रश्नों से आरम्भ होता है।

फ्मैं क्या हूं?य् ब्रह्मांड किसने बनाया?य् फ्यदि ईश्वर ने बनाया है तो उससे हमारा क्या संबंध है?य् फ्ईश्वर को प्रसन्न करने का सम्यक मार्ग क्या है?य् फ्अहं तथा ब्रह्म में क्या अंतर है?य् ‘‘किसे श्रेष्ठ जीवन कहते हैं?य् अथवा फ्ईश्वर कैसे प्रसन्न होता हैय्? आदि।

इनमें से कई प्रश्न धर्मतत्व, आत्मतत्व, दर्शन और नैतिकशास्त्र से जुड़े हुए हैं, जो धर्म के विभिन्न तत्व हैं। परन्तु एक प्रश्न है, जो धर्म की शिक्षा एवं प्रचार से पूछा जाता है और जो अनुत्तरित है कि श्रेष्ठ जीवन क्या है? जिस धर्म में ऐसा नहीं वह धर्म नहीं।

ब्राह्मणों ने हिंदूधर्म को इस प्रकार नग्न क्यों किया? उसे नैतिकता विहीन क्यों किया? हिंदूधर्म इसको छोड़कर कुछ नहीं है जिसमें अनगिनत देवी-देवता और पेड़-पौधे पूजे जाते हैं, तीर्थ यात्राएं की जाती हैं, और ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है। क्या इस धर्म की रचना मात्र इसलिए की गई है कि ब्राह्मणों की रोटी-रोजी चलती रहे? क्या उन्होंने कभी सोचा है कि नैतिकता ही समाज का आधार है और जब तक ध र्म में नैतिकता का समावेश नहीं किया जाता वह...... तत्व है। ब्राह्मणों को इन प्रश्नों का उत्तर देना है। ख्1,

  1. पाण्डुलिपि में यह अक्षर नष्ट हो गया है।