परिशिष्ट-5: वेदों की निम्रन्तिता - Page 192

परिशिष्ट - 5

वेदों की निर्भ्रान्न्ता

हिन्दुओं से यह आशा की जाती है कि वे प्रतिदिन वेद पाठ करें। शतपथ ब्राह्मण में इसके कारण बताए गए हैं। उसका कहना हैः

फ्केवल ये पांच महा त्याग हैं जिनका अत्यधिक महत्व है जैसे, जीव-जंतुओं को दाना आदि चुगाना, मनुष्यों को दान, पिता की सेवा, भगवत् पूजा, और वेद पाठ (ब्रह्म यज्ञ) 2. जीवित प्राणियों को प्रतिदिन दाना पानी दें ख्1, । उनके प्रति इतना ही कर्तव्य है। किसी को कुछ न कुछ दान प्रतिदिन दें। चाहे कटोरी भर पानी ही पिलाएं, मानव के प्रति दान-दक्षिणा का कर्त्तव्य पूरा हो जाता है। ईश्वर की पूजा में भी प्रतिदिन भागीदार बनना चाहिए ख्2, । यहां तक कि लकड़ी का गट्ठा चढ़ाकर भी। यह ईश्वर की भक्ति पूर्ण हुई। 3. अब हैं वेदों के प्रति कर्तव्य। इसका अर्थ है उनका एकांत पाठ ख्3, । इस कार्य में वाणी जुहू है, आत्मा उपभृत है, नेत्र ध्रुव हैं और बुद्धि श्रुव ख्4, है। सत्य अर्पण है और स्वर्ग लक्ष्यसिद्धि। जो इसे जानकर प्रतिदिन वेद-पाठ करता है, वह अविकारी लोक में जाता है। वह विद्यमान से तीन गुना बड़ा लोक है। उस लोक में सम्पदा का साम्राज्य है। इसलिए वेदों का अध्ययन किया जाए। 4. ऋग्वेद की ऋचाएं भगवान के लिए दूध का अर्घ्य हैं। जो इसे जानता है वह प्रतिदिन वेद पाठ करता है। प्रतिदिन भगवान को दुग्ध अर्पण से संतुष्ट करता है और देवता संतुष्ट होकर उसे धनधान्य से सम्पन्न, स्वास्थ्य, पौरुष तथा दैहिक शक्ति प्रदान करते हैं। उन्हें विलक्षण वरदान देते हैं। पिता की सेवा से घी और शहद की नदियां बहती हैं। 5. ईश्वर के लिए यजुस मंत्रों का पाठ घी की आहुति है। जो इसे जानता है, जो इनका नित्य पाठ करता है, वह देवताओं को घी

  1. जैसा कि मैंने जे. आफरेच्ट को पढ़ा है इसके अनुसार पक्षियों को दाना डाला जाता था। यह बोटलिंग्क और रोथ

शब्द कोश में है। दूसरे यज्ञ के बारे में कोलब्रुक के मिस्लेनियस ऐस्सेज पृष्ठ-150, 153, 182 देखें। फुट नोट 203 2. यह कात्यायन के श्रौत सूत्र से संबद्ध है जिसका उल्लेख प्रो. आफरेच्ट ने किया है। यह मनुस्मृति में भी

उपलब्ध है अध्याय 3, 210, 214, 218

  1. स्वाध्याय स्वयशाखाध्यानम् (अपनी शाखा में वेद-अध्ययन)

  2. प्रो. मूलर के फयुनरल राइटस आफ ब्राह्मन्स लेख में इनके चित्र दिए हैं देखें जर्नल ऑफ दि जर्मन ओरि. सै­

क्सन खण्ड 9

दि इनफालिबिल्टी ऑफ वेदाज पर छह पृष्ठों की यह टंकित प्रति है और लेखक ने इसमें कोई संशोधन या परामर्श अंकित नहीं किया। इस अध्याय के बाद का हिस्सा उपलब्ध नहीं है। - संपादक