सोलहवीं पहेली
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फ्अब मैं संक्षेप में बताता हूं कि किस क्रम से अपने गुणानुसार आत्माएं अपनी स्थिति को पहुंचती हैं। 40. सत्व सम्पन्न आत्माएं देवता बन जाती हैं, रजोगुणयुक्त मनुष्य बनते हैं, जबकि तमोगुण वाली वन्य-जंतु होती हैं- यह तीन गतियां हैं। 43. हाथी, अश्व, शूद्र और प्रताणनीय म्लेच्छ, सिंह, बाघ और सूकर की मध्यम अंधकार स्थिति को प्राप्त होते हैं। 46. राजा, क्षत्रिय, राज पुरोहित और वे व्यक्ति जिनका मुख्य व्यवसाय वाद-प्रतिवाद है वे दुर्वासना की मध्य स्थिति को प्राप्त होते हैं। 48. भक्त, तापस, ब्राह्मण, विमानारूढ़ देवतागण, तारामंडल, दैत्यों में न्यूनतम सदगुणी होते हैं। 49. अग्निहोत्री, ऋषि, देवतागण, वेद, दिव्य ज्योर्तिपुंज, वर्ष, पितृगण, साध्यगण द्वितीय प्रकार के सदगुण युक्त होते हैं। 50. स्रष्टा ब्रह्मा, सदाचारिता, जो महान् (महत्) है, जो अव्यक्त है, उसमें सर्वाधिक सद्गुण विद्यमान होते हैं।य्
हां, मनु ऋग्वेद को मान्यता प्रदान करते हैं परन्तु उनके विचारों की तुलना करना व्यर्थ है। उसमें, मौलिकता का अभाव है। वह ऋग्वेद के ही अनुगामी हैं।
IV
यह अच्छा रहेगा कि हम रामायण और महाभारत से इस मत की तुलना करें।
रामायण का कथन है कि चारों वर्ण, मनु की संतान हैं, दक्ष की पुत्री और कश्यप ख्1, भार्या।
फ्सुनो, मैं तुम्हें बताता हूं। सर्वप्रथम प्रजापतियों ने प्रारंभ किया जो सबसे पूर्व समय में जन्मे थे। सर्वप्रथम कर्दम थे, फिर वोकृत, शेष, समस्रेय, शक्तिमान बहुपुत्र, स्थाणु, मरीचि, अत्रि, प्रबल क्रतु, पुलस्त्य, आंगिरस, प्रचेतस, पुलह, दक्ष, फिर वैवस्वत, अरिष्टनेमी और गौरवमूर्ति कश्यप जो अंतिम थे। दक्ष प्रजापति की साठ कन्याएं बताई जाती हैं। उनमें से अदिति, दिति, दनु, कालिका, ताम्र, क्रोध, मनु और अनला इन आठ सुन्दर कन्याओं का विवाह कश्यप से हुआ। प्रसन्न होकर कश्यप ने कहा- फ्तुम मेरे समान पुत्र उत्पन्न करो, तीनों लोकों का पोषण करो। अदिति, दित्ति, दनु, और कालिका तत्पर हो गईं किन्तु अन्य तैयार न हुईं। अदिति से तैंतीस देवता उत्पन्न हुए। आदित्य, वसु, रुद्र और दो अश्विनी पुत्र। कश्यप पत्नी मनु से मनुष्य जन्मे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ब्राह्मण का जन्म मुख से हुआ, क्षत्रिय का वक्ष से, वैश्य जंघाओं से, शूद्र चरणों से जन्मे। ऐसा वेद कहते हैं। अनला से शुद्ध फलों वाले वृक्ष उत्पन्न हुए।य् आश्चर्य! नितात आश्चर्य कि वाल्मीकि ने चार वर्णों की रचना प्रजापति के स्थान पर कश्यप से बताई। स्पष्ट है कि उनका ज्ञान सुनी-सुनाई बातों तक सीमित था। यह स्पष्ट है कि उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि वेद क्या कहते हैं।
- म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खण्ड 1, पृ. 116-117