सोलहवीं पहेली: चातुर्वर्ण्य - क्या ब्राह्मण अपनी उत्पत्ति से परिचित हैं? - Page 206

सोलहवीं पहेली

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में है, ब्राह्मण के अथवा क्षत्रिय के?य् वायु ने उत्तर दिया, ‘‘अपनी ज्येष्ठता के आधार पर पृथ्वी पर विद्यमान समस्त सम्पदा का स्वामी ब्राह्मण है, जो कर्त्तव्य-विधान में पारंगत है, उन्हें यह ज्ञात है। ब्राह्मण जो खाता है, पहनता है, लुटाता है, वह उसी का है। वह सभी जातियों में श्रेष्ठ है। प्रथम जन्मा और सर्वश्रेष्ठ। जिस प्रकार कोई स्त्री अपना पति (पहला) छिन जाने पर अपने देवर, जेठ को दूसरा पति बना लेती है, उसी प्रकार विपत्ति में ब्राह्मण पहला आश्रय है और इसके बाद कोई औरय्।

महाभारत के शांति पर्व में तीसरी व्याख्या दी गई हैः ख्1,

भृगु ने उत्तर दियाः इस प्रकार ब्रह्मा ने पहले अपनी शक्ति से प्रजापतियों के समान भव्य सूर्य और अग्नि को रचा। तब स्वामी ने सत्य, धर्मनिष्ठा, कठोर-भक्ति, सनातन वेद गुणकर्म, और स्वर्ग (प्राप्ति हेतु) की शुद्धता की सृष्टि की। उसने देवता, दानव, गंधर्व, दैत्य, असुर, महाराग, यक्ष राक्षस, नाग, पिशाच और मानव, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्ण प्राणी रचे। ब्राह्मण का वर्ण गौर, क्षत्रिय का लाल, वैश्य का पीत और शूद्र का काला बनाया। तब भारद्वाज ने प्रतिवाद कियाःय् यदि हर जाति के चार वर्ण (रंग) उसका परिचायक हैं तो इससे पहचान में भ्रांति होती है। लालसा, क्रोध, भय, लोभ, संताप, कुंठा, भूख, क्लांति, हम सब में समान हैं। तब जाति किस से निर्धारित होती है? स्वेद, मूत्र, मल, श्लेष्मा, पित्त और रक्त सब में समान हैं (सभी में शारीरिक विकार हैं) तब जाति किस से निर्धारित होती हैं? अवर्णित चल और अचल पदार्थ हैं, इनका वर्ण कैसे निर्धारित होता हैय्? भृगु ने उत्तर दिया, फ्जातियों में कोई अंतर नहीं है।य्

शांति पर्व में ही चौथी व्याख्या दी गई है। वह कहती हैः

भारद्वाज ने फिर पूछा परमश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि, मुझे बताएं वे क्या गुण हैं कि जिन से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बन जाता है?य् भृगु कहते हैं, फ्जो शुद्ध है, प्रसव तथा अन्य संस्कारों से पवित्र हैं, जिसको वेदों का सम्पूर्ण अध्ययन है, संस्कारों को शुद्धतापूर्वक पूर्णता से अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं, जो चढ़ावे से बचे पदार्थ ग्रहण करते हैं, अपने धर्म-गुरु से सम्बद्ध हैं, सदैव धर्मपरायण हैं और सत्य को समर्पित हैं--ब्राह्मण कहलाते हैं। उसमें सत्य के दर्शन होते हैं। जिसमें सत्य, उदारता, अनाक्रामकता, उपकारिता, सादगी, धैर्य और कठोर भक्ति परिलक्षित हैं--ब्राह्मण हैं। जो राजपद के कर्त्तव्य का पालन करता है, जिसे वेदाध्ययन का व्यसन है और जो आदान-प्रदान से प्रसन्नता अनुभव करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है। वह जो लगनपूर्वक पशुपालन करता है, जिसको कृषि कार्यों में रुचि है, जो शुद्ध है और वेदों के अध्ययन में पारंगत है- वह वैश्य है। वह जो हर प्रकार के भोजन व्यसनी है, सभी कार्य करता

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 139-40