सत्रहवीं पहेली
चार आश्रम - उनका कारण और परिणति
समाज को चार वर्णों में विभाजित कर डालना ही हिंदू समाज की एक मात्र विशिष्टता नहीं है। आश्रम धर्म भी एक अन्य है फिर भी इन दोनों में एक अंतर है। वर्ण धर्म समाज के संगठन का सिद्धांत है। दूसरी ओर आश्रम किसी के व्यक्तिगत जीवन को विनियमित करने का सिद्धांत है।
आश्रम धर्म के अनुसार व्यक्ति का निजी जीवन चार चरणों में विभाजित किया गया है। 1. ब्रह्मचर्य आश्रम, 2. गृहस्थाश्रम, 3. वानप्रस्थ आश्रम और 4. संन्यास आश्रम। ब्रह्मचर्य का सरलार्थ और भावार्थ है- अविवाहित स्थिति। इसका भावार्थ है- गुरु के पास विद्याध्यन करना। गृहस्थाश्रम का अर्थ है- वैवाहिक और पारिवारिक जीवन। संन्यास का तात्पर्य है- सांसारिकता का परित्याग। यह संसार के वीतराग की स्थिति है। वानप्रस्थ आश्रम - गृहस्थ एवं सन्यास के मध्य की स्थिति है। इसके अधीन यह समाज का अंग होता है किन्तु समाज से दूर रहता है। इसके नाम के अनुरूप अरण्य-निवास करना होता है।
हिंदुओं की मान्यता है कि समाज के कल्याण के लिए वर्ण-धर्म की भांति आश्रम-धर्म का पालन भी अनिवार्य है। वे दोनों को संयुक्त नाम देकर वर्णाश्रम धर्म कहते हैं। ये दोनों मिलकर हिंदू समाज की कठोर मर्यादाएं निर्धारित करते हैं। इससे पूर्व कि हम इसके तात्पर्य, विशदस्वरूप और इसकी उत्पत्ति पर विचार करें, यह ठीक रहेगा कि हम आश्रम-धर्म को समझ लें। आश्रम-धर्म दिर्ग्शन का साधन है।
इस सन्दर्भ में मनुस्मृति ख्1, से कुछ प्रासंगिक अंश पुनः प्रस्तुत हैंः
फ्गर्भ धारण के आठ वर्ष पश्चात् उपनयन संस्कार कराया जाए। क्षत्रिय का गर्भधारण के ग्यारह वर्ष पश्चात्, किन्तु वैश्य का बारह वर्ष उपरांत।य्
- मनुस्मृति, अध्याय 2, पृ. 36
यह 18 पृष्ठों की पाण्डुलिपि है। यह टंकित प्रथम प्रति है जिसमें थोड़ा अंश लेखक की हस्तलिखित लिपि में है। - संपादक