सत्रहवीं पहेली
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फ्कोई द्विज यदि वेदाध्ययन नहीं करता है और अन्य (सांसारिक ज्ञान) के अध्ययन में रत रहता है तो वह शीघ्र ही, अपितु अपने जीवन काल में ही शूद्र की स्थिति प्राप्त करता है और उसके बाद उसकी संतति भी।य् ख्1,
फ्गुरु के अधीन तीन वेदों के (अध्ययन) का व्रत छत्तीस वर्ष तक धारण किया जाए अथवा इसर्वे अर्द्धांश अथवा चतुर्थांश अथवा जब तक उनका पूरा ज्ञान न हो जाए, यह व्रत रखा जाए।य्
फ्जो उचित क्रम से तीन वेदों, अथवा दो अन्यथा एक का भी अध्ययन, बिना नियमोल्लंघन, कर लेता है, वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे ख्2, ।य्
फ्विद्यार्थी, गृहस्थ, एकांतवासी और तापस इनकी चार स्थितियां हैं। इन सबका उद्गम गृहस्थ है।य्
फ्किन्तु सभी (अथवा) कोई भी नियम, जिसका विधानानुकूल पालन किया गया हो, ब्राह्मण को उच्च स्थिति प्रदान करता है।य्
फ्और वैदिक नियमानुसार और स्मृति के अनुरूप गृहस्थ को उन सबमें श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि वह अन्य तीनों का सहायक है ख्3, ।य्
फ्कोई द्विज स्नातक जो नियमानुसार गृहस्थ धर्म निभा चुका हो वह दृढ़ संकल्प करे कि वह अपनी इन्द्रियों का दमन करेगा, अरण्य में रहेगा (निम्नलिखित नियमों का अनुसरण करेगा)।य्
फ्जब कोई गृहस्थ यह देखे कि उसकी त्वचा में झुर्रियां पड़ने लगी हैं और उसके बाल पकने लगे हैं और उसके पुत्रों को पुत्र (पौत्र) हो गए हैं तब वह वन को प्रस्थान करे ख्4, ।य्
फ्परन्तु इस भांति अपने जीवन का तीसरा भाग वनों में व्यतीत के उपरांत चौथे पन में, वह सभी सांसारिकताओं का परित्याग कर तापस का जीवन बिताए।य्
फ्तापस रूप में जो क्रम से चरणों में यज्ञ पूर्ण करके, इन्द्रियों का दमन करके, क्लांत हो जाता है (भिक्षादान और भोजन करा कर) वह मृत्यु उपरांत सुख भोगता है।य्
फ्जब वह तीनों ऋणों से उऋण हो जाता है तो मोक्ष के लिए सुरति लगाए, जो उऋण हुए बिना मुक्ति चाहता है, उसका पतन होता है।य्
मनुस्मृति, अध्याय 2, 168
वही, अध्याय 3, 1-2
वही, अध्याय 4, 87-9
वही, अध्याय 4, 1-2