सत्राहवीं पहेली: चार आश्रम - उनका कारण और परिणति - Page 213

198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्नियमानुसार वेदाध्ययन, पवित्र विधानुसार पुत्रवान होकर, योग्यतानुसार यज्ञ करके वह अपना ध्यान मोक्ष पर लगाए।य्

फ्कोई द्विज जो वेदाध्ययन बिना, पुत्रवान हुए बिना, यज्ञ के बिना मोक्ष चाहता है, उसका पतन होता है।य् ख्1,

इन नियमों से यह स्पष्ट है कि मनु के अनुसार आश्रम-धर्म के तीन रूप हैं। प्रथम यह कि यह शूद्रों और महिलाओं के लिए नहीं है। द्वितीय यह कि ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। ऐसे ही गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास अनिवार्य नहीं है। तृतीय यह कि इनका निर्धारित क्रम से पालन किया जाए। प्रथम ब्रह्मचर्य, द्वितीय गृहस्थ, तृतीय वानप्रस्थ और चतुर्थ संन्यास। कोई एक को लांघकर दूसरे आश्रम में नहीं जा सकता।

व्यक्तिगत जीवन में नियोजित अर्थ-व्यवस्था के लिए बताई जाने वाली इस आश्रम प्रणाली पर विहंगम दृष्टि डालने पर कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं। वेदों के संदर्भ में आश्रमों का यह सिद्धांत अज्ञात है। वेदों में ब्रह्मचारी का उल्लेख है, परन्तु ब्रह्मचर्य को जीवन का प्रथम और अनिवार्य सोपान बनाए जाने का कोई प्रसंग नहीं है। ब्राह्मणों ने व्यक्तिगत जीवन में ब्रह्मचर्य को अनिवार्य क्यों बनाया? आश्रम धर्म के संबंध में यह प्रथम भ्रांति है।

दूसरा प्रश्न यह है कि मनु ने व्यक्ति के लिए, एक ही क्रम में आश्रम प्रणाली क्यों रखी? इसमें संदेह नहीं रहा है कि एक समय ऐसा था, जब कोई ब्रह्मचारी तीनों में से कोई-सा भी आश्रम अपना सकता था। वह गृहस्थ बन सकता था अथवा गृहस्थ बने बिना संन्यासी भी बन सकता था। यह तुलना करें कि धर्मसूत्र इस विषय में क्या कहते हैं?

वशिष्ठ धर्म सूत्र ख्2, का मत हैः

फ्चार सोपान हैंः विद्यार्थी, गृहस्थ, एकांतवास और तापस।य्

फ्जिस व्यक्ति ने एक, दो अथवा तीन वेदों का अध्ययन विद्यार्थी धर्म का उल्लंघन किए बिना किया है, वह जिस आश्रम में जीवन बिताना चाहे, बिता सकता है।य्

गौतम धर्म सूत्र ख्3, का मत हैः

फ्कोई (बताता है कि) वह (जिसने वेदाध्ययन किया है) किसी भी आश्रम का चयन कर सकता है।य्

धर्मसूत्रों के विचार जानने पर यह स्पष्ट है कि एक समय था, जब गृहस्थाश्रम

  1. मनुस्मृति, अध्याय 6, 33-37

  2. मनुस्मृति, अध्याय 7, श्लोक 1, 2, 3

  3. वही, अध्याय 3, श्लोक 1 और 2