सत्राहवीं पहेली: चार आश्रम - उनका कारण और परिणति - Page 214

सत्रहवीं पहेली

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वैकल्पिक था। ब्रह्मचर्य के पश्चात् कोई वानप्रस्थ अथवा संन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकता था। मनु ने विकल्प क्यों समाप्त किया और गृहस्थ को क्यों अनिवार्य बनाया? उन्होंने वानप्रस्थ से पूर्व गृहस्थ को और संन्यास से पूर्व वानप्रस्थ को अनिवार्य क्यों घोषित किया?

गृहस्थाश्रम के पश्चात् जीवन के दो सोपान हैं, वानप्रस्थ और संन्यास। प्रश्न यह है कि मनु ने यह आवश्यक क्यों माना कि गृहस्थाश्रम के पश्चात् दो आश्रम और रखे जाएं? संन्यास-आश्रम ही क्यों पर्याप्त नहीं? वानप्रस्थ और संन्यास-आश्रम के लिए निर्धारित नियम कुछ इतने समान हैं कि असमंजस होता है।

मनु ने वानप्रस्थ और संन्यास की जो तुलनात्मक संहिता बनाई है, उसकी सारणी निम्नांकित हैः

वानप्रस्थ के लिए संहिता

फ्कृषि द्वारा अर्जित समस्त प्रकार के आहार तथा समस्त संपत्ति को छोड़कर वन में जाने की इच्छा नहीं करने वाली अपनी पत्नी को पुत्रों के उत्तरदायित्व में सौंपकर तथा वन में साथ जाने की इच्छा करने वाली अपनी पत्नी को साथ में लेकर वन को जाए।य् अध्या. 6-3

फ्पवित्र अग्नि और यज्ञ पात्र आदि लेकर ग्राम से बाहर वन में जाकर जितेन्द्रिय होकर रहे।य् अध्या. 6-4

फ्तापस योग्य विविध पवित्र खाद्य पदार्थ, कंद-मूल, फल आदि से पूर्वोक्त पंचमहायज्ञों का विधिपूर्वक पालन करता रहे।य् अध्या. 6-5

फ्मृग आदि का चर्म या पेड़ों का वल्कल धारण करे, सायंकाल तथा प्रातःकाल स्नान करे और सर्वदा जटा, दाढ़ी, मूंछ एवं नख को (उच्छेदन रहित) धारण करे।य् अध्या. 6-6

फ्जो भोज्य पदार्थ हो, उसी से बलि करे, सामर्थ्यानुसार दान दे, भिक्षा दे और जल, कंद तथा फलों की भिक्षा देकर आये हुए अतिथियों का सत्कार करे।य् अध्या. 6-7

फ्सर्वदा वेदाभ्यास में लगा रहे, ठंडा-गर्म, सुख-दुख, अपमान आदि द्वंद्वों को सहन करे, सबसे मित्रभाव रखे, मन को वश में रखे, दानशील बने, दान न ले, सब जीवों पर दया करेय् अध्या. 6-8

फ्दर्श, पौर्णमास पर्वों को यथासमय त्याग नहीं करता हुआ विधिपूर्वक तीन अग्नियों के साथ अग्निहोत्र करता रहे।य् अध्या. 6-9

फ्नक्षत्रेष्ठि, आग्रहायण याग, चातुर्मास्य याग, उत्तरायण याग और दक्षिणायन याग को श्रोतस्मार्त विधि से क्रमशः करे।य् अध्याय 6-10