200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
फ्वसन्त तथा शरद ऋतु में पैदा हुए एवं स्वयं लाये गये पवित्र मुन्यन्नों से पुरोडश तथा उबले अन्न करूको शास्त्रानुसार अलग-अलग तैयार करे।य् अध्या. 6-11
फ्वन में उत्पन्न अत्यंत पवित्र और हविष्यान्न से देवों के उद्देश्य हवन कर बचे हुए अन्न का भोजन करें तथा स्वयं बनाये हुए लवण को काम में लायें।’’ अध्या. 6-12
फ्भूमि तथा जल में उत्पन्न शाकों (सब्जियों), पवित्र पुष्प, मूल तथा फल को, और पवित्र वृक्ष-उत्पादों और अरण्य-फलों से शोधित तैल का भोजन करे।फ् अध्या. 6-13
फ्मधु, मांस, पृथ्वी में उत्पन्न छत्रांक, भूस्तृण, शिग्रक और लसोड़े के फूल का त्याग करे।फ् अध्या. 6-14
फ्पूर्वसंचिता मुन्यन्न, पुराने वस्त्र और शाक कन्द एवं फल का आश्विन मास में त्याग कर दे।य् अध्या. 6-15
फ्वन में भी हल से जुती हुई भूमि में उत्पन्न या किसी के फेंके हुए अन्न को तथा ग्राम में उत्पन्न मूल और फल को क्षुधा पीडि़त होकर भी न खाए।’’ अध्या. 6-16
फ्अग्नि में पकाये हुए अन्न आदि को खाने वाला बने, अथवा नियम समय पर पकने वाले पदार्थों को खाने वाला बने अथवा पत्थर से पीस कर या दांतों से चबाकर
खाने वाला बने।य् अध्या 6-17
फ्भोजन पात्रों को वह खाने के बाद तुरंत धोए, या एक मास का संग्रह रखे, अथवा छः मास या वर्ष पर्यंत का समुचित प्रबंध करे।य् अध्या. 6-18
फ्यथाशक्ति अनन को लाकर सायंकाल या दिन में या एक दिन पूरा उपवास कर दूसरे दिन सायंकाल या तीन रात उपवास कर चौथे दिन सायंकाल भोजन करे।य् अध्या. 6-19
फ्अथवा शुक्ल तथा कृष्णपक्ष में चान्द्रायण के नियम से भोजन करे, अथवा अमावस्या तथा पूर्णिमा को दिन या रात्रि में केवल एक बार पकाई हुई ययागूका भोजन करे।य् अध्या. 6-20
फ्अथवा वैखानस आश्रम में रहने वाला सर्वदा वेवल समय पर पके और स्वयं गिरे हुए फल-मूल से ही जीवन निर्वाह करे।य् अध्या. 6-21
मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 38-45
वही, अध्याय 6, 207
वही, अध्याय 6, 208