सत्राहवीं पहेली: चार आश्रम - उनका कारण और परिणति - Page 216

सत्रहवीं पहेली

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फ्भूमि पर लेटे तथा टहले या पैर के अगले भाग पर दिन में कुछ समय तक

खड़ा रहे या बैठा रहे तथा प्रातःकाल मध्याह्नकाल तथा सायंकाल में स्नान करे।य् अध्या. 6-22

फ्अपनी तपस्या को बढ़ाता हुआ ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि ले, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में रहे और शीत ऋतु में गीला कपड़ा धारण करे।य् अध्या. 6-23

फ्तीनों समय स्नान करता हुआ देवताओं, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण करे और कठोर तपस्या करता हुआ अपने शरीर को सुखा दे।य् अध्या. 6-24

फ्वानप्रस्थाश्रम के नियमानुसार वैतानिक अग्नि को आत्मा में रखकर वन में भी अग्नि और गृह का त्यागकर केवल मूल और फूल को खाये।य् अध्या. 6-25

फ्सुख साधक साधनों में उद्योग को छोड़कर ब्रह्मचारी भूमि पर सोने वाला निवास-स्थान में ममस्वरहित हो पेड़ों के मूल को घर समझ कर निवास करे।य् अध्या. 6-26

फ्जीवन निर्वाह के लिये केवल तपस्वी वानप्रस्थाश्रमियों के यहां भिक्षाग्रहण करे और उनका भी अभाव होने पर वन में निवास करने वाले अन्य गृहस्थ द्विजों से भिक्षा ग्रहण करे।य् अध्या. 6-27

फ्उन वनवासी गृहस्थों का भी अभाव होने पर वन में ही निवास करता हुआ ग्राम से वृक्ष-पत्रों में या सकारों के खंडों में अथवा हाथ में ही भिक्षा को लाकर केवल आठ ग्रास भोजन करे।य् अध्या. 6-28

फ्वन में निवास करता हुआ ब्राह्मण इन नियमों को तथा शास्त्रोक्त नियमों का पालन करते हुए और आत्मसिद्धि के लिए उपनिषदों तथा वेदों में कथित वचनों का अभ्यास करे।य् अध्या. 6-29

संन्यासी के लिए संहिता

फ्जिसमें समस्त सम्पत्ति को दक्षिणा रूप में देते हैं ऐसे प्राजापत्य यज्ञ को अनुष्ठान कर और उसमें कथित विधि से अपने में अग्नि का आरोपकर ब्राह्मण घर से संन्यास आश्रम को ग्रहण करे।य् अध्या. 6-38

फ्जो सब प्राणियों को अभय देकर गृह से संन्यास ले लेता है, वह ब्रह्मज्ञानी तेजोमय लोक होता है। अर्थात् वह उन लोकों को प्राप्त करता है।य् अध्या. 6-39

फ्जिस द्विज से जीवों को लेशमात्र भी भय नहीं होता, शरीर से विमुक्त हुए उस द्विज को कहीं से भी भय नहीं होता।य् अध्या. 6-40

  1. मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 209