सत्राहवीं पहेली: चार आश्रम - उनका कारण और परिणति - Page 217

202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्पवित्र कमण्डल, दंड आदि से युक्त मौन धारण किया हुआ घर से निकला हुआ और उपस्थित इच्छा प्रवर्तक वस्तु में निःस्पृह होकर संन्यास ग्रहण करे।य् अध्या. 6-41

फ्अकेले सिद्धि को देखता हुआ द्विज दूसरे किसी का साथ न करके अकेला ही मोक्ष के लिए चले, इस प्रकार वह किसी को नहीं छोड़ता है और न उसे कोई छोड़ता है।य् अध्या. 6-42

फ्लौकिक अग्नि से रहित, गृह से रहित, शरीर में रोगादि होने पर भी चिकित्सा आदि का प्रबंध न करने वाला, स्थिर बुद्धिवाला, ब्रह्म का मनन करने वाला और ब्रह्म में भी भाव रखने वाला संन्यासी भिक्षा के लिए ग्राम में प्रवेश करे।य् अध्या. 6-43

फ्खपरा, पेड़ों की जड़, पुराना व मोटा या वृक्ष के वल्कल कपड़ा, अकेलापन, ममता और सबमें समान भाव, ये मुक्ति के लक्षण हैं।य् अध्या. 6-44

फ्मरने या जीने की चाह ने करे किन्तु नौकर जिस प्रकार वेतन की प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार काल की प्रतीक्षा करता रहे।य् अध्या. 6-45

फ्ब्रह्म ध्यान में लीन योगासनों में बैठा हुआ, अपेक्षा से रहित, मांस की अभिलाषा से रहित और शरीर मात्र सहायक से युक्त मोक्ष सुख को चाहने वाला इस संसार में विचरण करे।य् अध्या. 6-49

फ्चमत्कार और शकुन विचार, नक्षत्र विद्या, हस्तरेखा विज्ञान के चातुर्य, अंगविद्या, अनुशासन आदि के सहारे किसी भी प्रकार की भिक्षा लेने की इच्छा न करे।य् अध्या. 6-50

फ्बहुत से वानप्रस्थों या अन्य साधुओं, ब्राह्मणों, पक्षियों, कुत्तों या दूसरे भिक्षुओं से युक्त घर में न जाए।य् अध्या. 6-51

फ्बाल, नाखून और दाढ़ी-मूंछ कटवाकर, भिक्षापात्र, दण्ड तथा कमण्डल को लिये हुए, किसी प्राणी को पीडि़त न करता हुआ सर्वदा विचरण करे।य् अध्या. 6-52

फ्उसके भिक्षापात्र धातु के न हों, छिद्र रहित हों, उनकी शुद्धि यज्ञ में चमस के समान केवल पानी से होती है।य् अध्या. 6-53

फ्तुम्बा, लकड़ी, मिट्टी, बांस के पाच्यतियों के हों ऐसा स्वायंभुव पुत्र मनु ने कहा है।य् अध्या. 6-54

फ्संन्यासी जीवन-निर्वाह के लिये दिन में एक बार ही भिक्षा ग्रहण करे, तथा उसको भी अधिक प्रमाण में लेने में आसक्ति न करे, क्योंकि भिक्षा में आसक्ति रखने वाला संन्यासी विषयों में भी आसक्त हो जाता है।य् अध्या. 6-55