सत्राहवीं पहेली: चार आश्रम - उनका कारण और परिणति - Page 218

सत्रहवीं पहेली

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फ्घरों में जब धुआं दिखाई न पड़ता हो, मूसल का शब्द न होता हो, आग बुझ गयी हो, सब लोग भोजन कर चुके हों, और खाने के पत्तल बाहर फेंक दिये गये हों, तब भिक्षा के लिए संन्यासी सर्वदा निकले।य् अध्या. 6-56

फ्भिक्षा न मिलने पर विषाद और मिलने पर हर्ष न करे। जितनी भिक्षा से जीव निर्वाह हो सके, उतने ही प्रमाण में भिक्षा मांगे। दण्ड, कमण्डल आदि की मात्रा में भी आसक्ति न करे।य् अध्या. 6-57

फ्विशेष रूप से आदर-सत्कार के साथ मिलने वाली भिक्षा की सर्वदा निंदा करे, क्योंकि पूजापूर्वक होने वाली भिक्षा प्राप्ति से मुक्त भी संन्यासी बंध जाता है।य् अध्या. 6-58

फ्विषयों की ओर आकृष्ट होती हुई इन्द्रियों को थोड़ा भोजन और एकांतवास के द्वारा रोके।य् अध्या. 6-59

फ्इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से रोकने से, राग और द्वेष के त्याग से और प्राणियों की अहिंसा से मुक्ति के योग्य होता है।य् अध्या. 6-60

फ्जब विषयों में दोष की भावना से सब विषयों से निःस्पृह हो जाता है, तब इस लोक में तथा परलोक में नित्यसुख को प्राप्त करता है।य् अध्या. 6-80

फ्इस प्रकार सब संगों को धीरे-धीरे छोड़कर तथा सब द्वंद्वों से छुटकारा पाकर ब्रह्म में ही लीन हो जाता है।य् अध्या. 6-81

फ्यह सब परमात्मा में ध्यान से होता है। अध्यात्म ज्ञान से शून्य ध्यान का फल कोई भी नहीं प्राप्त करता है।य् अध्या. 6-82

फ्यज्ञ तथा देव के प्रतिपादक वेदमंत्र को, जीवन के स्वरूप के प्रतिपादक वेदमंत्र को और ब्रह्मप्रतिपादक वेदान्त में वर्णित मंत्र को जपे।य् अध्या. 6-83

फ्वेदार्थ को नहीं जानने वाले के लिए यही वेद शरण है, और वेदार्थ जानने वाले के लिए स्वर्ग चाहने वालों के लिए भी वेद शरण है।य् अध्या. 6-84

फ्इस क्रम से जो द्विज संन्यास लेता है वह इस संसार में पाप को नष्ट कर उत्कृष्ट ब्रह्म को प्राप्त करता है।य् अध्या. 6-85

वानप्रस्थ की संन्यास से और गृहस्थाश्रम की संन्यास से तुलना करने पर इनके मध्य स्पष्ट साम्यता का पता चलता है। जब वानप्रस्थ की संन्यास से तुलना करते हैं तो उनके अनुसार जीवनयापन में बहुत कम अंतर मिलता है। प्रथम यह कि वानप्रस्थ अपनी पत्नी और सम्पत्ति के अधिकार का त्याग नहीं करता है। परन्तु संन्यासी को दोनों का त्याग करना पड़ता है। दूसरी बात यह है कि वानप्रस्थ का निवास स्थायी