सत्राहवीं पहेली: चार आश्रम - उनका कारण और परिणति - Page 219

204 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

होता है, चाहे वह वनवास ही क्यों न हो। किन्तु संन्यासी का आवास स्थायी नहीं होता, यहां तक कि वनों में भी उसे स्थान-स्थान पर रमण करना होता है। तीसरे यह कि संन्यासी के लिए शास्त्रों की व्याख्या करने पर प्रतिबंध है, जबकि वानप्रस्थ के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है। जहां तक अन्य बातों का प्रश्न है, वे एक समान हैं।

गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम के बीच भी बहुत साम्य है। मूलरूप से वानप्रस्थी गृहस्थ ही है जैसे वानप्रस्थी का वैवाहिक जीवन जारी रहता है। गृहस्थी के समान वह सम्पत्ति का स्वामी रहता है। गृहस्थ की भांति वह संसार का त्याग नहीं करता। वह वैदिक धर्म का पालन करता है। गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ के बीच तीन बातों का अंतर हैः (1) गृहस्थ के भोजन और वस्त्र पहनने में कोई सादगी नहीं है, जबकि वानप्रस्थ के लिए ऐसी व्यवस्था है, (2) गृहस्थ समाज के मध्य रहता है, जबकि वानप्रस्थ को वनों में रहना होता है, (3) वानप्रस्थी, वेदांत का अध्ययन कर सकता है, जबकि गृहस्थ वेदों तक ही सीमित रहता है। शेष बातों में साम्यता है।

गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम के बीच इतनी सारी साम्यताओं के रहते हुए, यह समझना कठिन है कि मनु ने गृहस्थाश्रम और संन्यास के बीच वानप्रस्थ की रचना क्यों की, क्योंकि एक आश्रम दूसरे से बिल्कुल भिन्न होता है। वास्तव में केवल तीन आश्रम हो सकते थे- (1) ब्रह्मचर्य, (2) गृहस्थ, (3) संन्यास। शंकराचार्य का मत भी ऐसा ही लगता है, जिन्होंने अपने ब्रह्म-सूत्र में, संन्यास को सही बताते हुए पूर्व मीमांसा परम्परा के विपरीत तीन ही आश्रमों की बात कही है।

मनु को वानप्रस्थाश्रम की बात कैसे सूझी? उनको प्रेरणा कहां से मिली? जैसा कि पहले कहा जा चुका है, ब्रह्मचर्य के पश्चात् गृहस्थाश्रम अनिवार्य नहीं था। ब्रह्मचारी गृहस्थाश्रम अपनाए बिना सीधा संन्यासी बन सकता है। परन्तु मानव का अन्य भी एक चरण था। जो ब्रह्मचारी तुरन्त विवाह नहीं करना चाहता था, वह अरण्यमानस ख्1, (वनवासी) बन सकता था। वे ऐसे ब्रह्मचारी थे, जो अविवाहित रहकर अध्ययन जारी रखना चाहते थे। ये अरण्यवासी आबादी से दूर वनों में रहते थे। जिन वनों में अरण्य तापस बसते थे, वे आरण्यक कहलाते थे। यह स्पष्ट है कि मनु का वानप्रस्थ दो भिन्नताओं के कारण मौलिक अरण था। 1. वह वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने से पूर्व स्वबंधित ‘अरण’ था और 2. यह अरण अवस्था, द्वितीय अवस्था के स्थान पर तृतीय अवस्था कहलाती थी। मनु का पूरा कार्यक्रम इस सिद्धांत पर आधारित था कि विवाह अनिवार्य है। कोई ब्रह्मचारी यदि संन्यासी बनना चाहता है तो उसे वानप्रस्थ में जाना होता था और वानप्रस्थ बनने के लिए गृहस्थ बनना अनिवार्य था अर्थात् उसे विवाह करना चाहिए। मनु ने विवाह से मुक्ति को असंभव बना दिया। क्यों?

  1. राजा कुमुद मुकर्जी-एंशिएंट इंडिया एजूकेशन, पृ. 6