उन्नीसवीं पहेली: पितृत्व से मातृत्व की ओर-ब्राह्मण इससे क्या लाभ प्राप्त करना चाहते थे? - Page 234

उन्नीसवीं पहेली

पितृत्व से भातृत्व की ओरः ब्राह्मणों को इससे क्या मिला?

हिंदू विधान पर अपने शोध प्रबंध में मयने ने संकेत दिया है कि सगोत्रता विधान में कुछ विसंगतियां हैं। उनका कथन हैः

हिंदू विधान में इतनी विसंगतियां और कहीं नहीं हैं, जितनी पारिवारिक संबंधों के प्रसंग में हैं। इससे न केवल प्राचीन समाज और आधुनिक समाज के बीच में निरंतरता पूर्णतया छिन्न-भिन्न हो गई है बल्कि प्राचीन व्यवस्था की विभिन्न प्रणालियों के बीच प्रत्यक्ष टकराव भी दृष्टिगोचर होता है। उसमें एक उत्तराधिकार विधान है, जिसमें अविरल चौदह पीढि़यों तक पुरुष पूर्वज की संभावना का अनुमान किया जाता है। साथ ही कुटुम्ब-विधान है जिसमें कतिपय स्वीकृत पद्धतियां शील भ्रष्टीकरण और बलात्कार के प्रति मात्र प्रियोक्तियां हैं। जहां बारह प्रकार के पुत्रों को मान्यता है और इनमें से अधिकांश का पिता से कोई रक्त-संबंध नहीं होता।

इन विसंगतियों का अस्तित्व वास्तव में विद्यमान है जो हिन्दू-विवाह तथा पितृत्व विधान का अध्ययन करने पर स्पष्ट हो जाएगा।

हिन्दू विधान में आठ प्रकार के विवाहों को मान्यता है। उनके नाम इस प्रकार हैंः

  1. ब्रह्म 2. देव, 3. आर्ष, 4. प्रजापात्य 5. आसुर, 6. गंधर्व, 7. राक्षस और
  2. पिशाच।

ब्रह्म विवाह के अनुसार किसी वेद ज्ञाता को वस्त्रालंकृत पुत्री उपहार में दे दी जाती थी जिसे उसका पिता स्वेच्छा से आमंत्रित करके उसकी सम्मानपूर्वक अगवानी करता था।

देव-विवाह वह था जब कोई पिता अपने घर यज्ञ करने वाले पुरोहित को दक्षिणास्वरूप अपनी पुत्री दान कर देता था।

आर्ष विवाह के अनुसार वर वधू के पिता को उसका मूल्य चुका कर प्राप्त करता था।

यह ग्यारह पृष्ठों की टंकित सामग्री है। अध्याय के शीर्षक को छोड़कर लेखक की हस्तलिपि में और कुछ भी नहीं जोड़ा गया है। - संपादक