220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रजापात्य विवाह का अर्थ है, वर द्वारा वधू के पिता से पुत्री प्रदान करने का आग्रह। प्रजापात्य और ब्रह्म विवाह में अंतर यह था कि एक में पिता द्वारा पुत्री को उपहारस्वरूप तो दे दिया जाता था किन्तु इसके लिए आग्रह की आवश्यकता थी। आसुर विवाह वह था, जब वर-वधू के पिता और इसके संबंधियों को उनकी पुत्री के बदले क्षमता भर सम्पति देता था और पुत्री को भी धन दिया जाता था। आर्ष और आसुर विवाह के मध्य कोई अंतर नहीं था। दोनों में पुत्री बेची जाती थी। अंतर मात्र इतना था कि आर्ष में पुत्री का मूल्य निश्चित किया जाता था जबकि आसुर विवाह में मूल्य निश्चित नहीं किया जाता था।
गंधर्व विवाह से आशय यह है जिसमें अधार्मिक तथा इन्द्रिय सुख हेतु परस्पर सहमति से विवाह होता था। राक्षस विवाह उसे कहते थे जब किसी कन्या को वर-पक्ष वाले बरबस उठा ले जाते थे। जब यह सहायता के लिए रोती-चिल्लाती थी तो उसका घर ध्वस्त करा दिया जाता और उसके परिजन और उनके मित्रों को युद्ध में आहत कर दिया जाता था अथवा उनका वध कर दिया जाता था।
पिशाच विवाह का अर्थ है किसी कन्या के साथ बलात्कार, जबकि वह निद्रामग्न हो अथवा उसे अतिमादक मदिरा पिलाकर उसकी बुद्धि का हरण कर लिया गया हो।
हिन्दू विधान के अनुसार तेरह प्रकार के पुत्र होते थे। 1. औरस, 2. क्षेत्रज, 3. पुत्रिका पुत्र, 4. कानीन, 5. गुह्मज, 6. पुनर्भव, 7. सहोदज, 8. दत्तक, 9. कृत्रिम, 10. क्रीत 11. अपविध, 12. स्वयंदत्त, और 13. निषाद।
औरस पुत्र वे होते थे जो किसी व्यक्ति द्वारा अपनी वैध पत्नी से उत्पन्न किए जाते थे।
फ्पुत्रिकापुत्रय् से आशय है, पुत्री से उत्पन्न पुत्र। इसका महत्व यह है कि इस प्रथा के अनुसार कोई पिता, जिसका अपना पुत्र नहीं होता था, वह अपनी पुत्री से किसी व्यक्ति द्वारा पुत्र उत्पन्न कराता था। यदि इस शारीरिक संबंध के कारण उस कन्या को पुत्र प्राप्त हो जाता था तो वह बालक पुत्रीका पुत्र कहा जाता है। किसी व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त था कि अपनी पुत्री का विवाह कर देने के पश्चात् भी पुत्र प्राप्ति हेतु उसे विवश कर सकता था कि उसकी पुत्री उसके द्वारा नियत पुरुष के साथ संभोग करे। इसी कारण यह चेतावनी दी जाती थी कि उस कन्या के साथ विवाह न किया जाए, जिसके भ्राता न हों।
क्षेत्रज के शब्दार्थ और भावार्थ समान हैं। इसका अर्थ है-क्षेत्र से उत्पन्न पुत्र-क्षेत्र का अर्थ है पत्नी। हिंदू आदर्शों के अनुरूप स्त्री खेत के समान है और पति उस खेत का स्वामी है। यदि पति की मृत्यु हो जाती थी अथवा वह जीवित होता था परन्तु नपुंसक होता था अथवा उसे असाध्य रोग होता था तो उसका भ्राता अथवा अन्य सपिण्ड व्यक्ति उससे पुत्र उत्पन्न कर सकता था। इस प्रथा को फ्नियोगय् कहते थे। इस प्रकार उत्पन्न पुत्र फ्क्षेत्रजय् कहलाता था।
यदि कन्या अपने पिता के घर अवैध संबंधों के कारण गर्भवती हो जाती और