उन्नीसवीं पहेली: पितृत्व से मातृत्व की ओर-ब्राह्मण इससे क्या लाभ प्राप्त करना चाहते थे? - Page 236

उन्नीसवीं पहेली

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किसी पुत्र को जन्म देती और यदि फिर उसका विवाह हो जाए तो विवाह पूर्ण जन्मे पुत्र पर उसके पति का अधिकार हो जाता है जो फ्कानीनय् कहलाता था।

फ्गुह्मजय् वे पुत्र होते थे, जब किसी स्त्री के अपने पति से संबंध तो हों, परन्तु यह समझना कठिन हो कि पुत्र उसी का है अर्थात् जहां यह संदेह हो कि पुत्र अनाचार का परिणाम है। जब इस बात का साक्ष्य न हो तो अनुमान के आधार पर वह पुत्र उस स्त्री के पति का होता है। वह इसी कारण ‘गुह्मज’ कहलाता है कि उसका पिता संदिग्ध है।

फ्सहोदजय् वे पुत्र होते थे जब कोई कन्या अपने विवाह के समय गर्भवती होती थी और यह निश्चय नहीं होता था कि पुत्र उसके पति का है जिसके उस कन्या के साथ पहले से ही शारीरिक संबंध होते थे अथवा वह किसी अन्य व्यक्ति का बीज है। परन्तु यह निश्चिंत था फ्सहोदजय् उस गर्भवती स्त्री से उस व्यक्ति का उत्पन्न पुत्र माना जाता था जिसके साथ उस कन्या का विवाह होता था। फ्पुनर्भवय् उस स्त्री का पुत्र है जिसे उसके पति ने त्याग दिया हो और वह अन्य के साथ सहवास के पश्चात् पुनः अपने घर आ गई हो। इससे ऐसी स्त्री के पुत्र का भी बोध होता है जो एक नपुंसक, अस्पृश्य, अथवा पागल या मृत पति के बाद दूसरा पति चुन लेती है।

फ्पारासवय् ख्1, वे पुत्र होते थे जो किसी ब्राह्मण द्वारा शूद्र नारी से उत्पन्न किए जाते थे। शेष पुत्र गोद लिए गए पुत्र होते थे जिन पर पितृत्व अधिकार होता था।

फ्दत्तकय् ऐसा पुत्र है जिसे उसके माता-पिता किसी को दे देते थे। उसे प्राप्तकर्ता का पुत्र माना जाता था।

फ्कृत्रिमय् पुत्र का अर्थ है केवल प्राप्तकर्ता की इच्छा से प्राप्त पुत्र। ‘क्रीत’ ऐसा पुत्र, जिसे उसके अभिभावकों से क्रय किया जाता था।

फ्अपविधय् ऐसा पुत्र है जिसका उसके जनक परित्याग कर दे और पुनः गोद ले लें और अपना पुत्र मान लें।

फ्स्वयंदत्तय् ऐसा पुत्र है जिसे उसके जनक त्याग दें और वह किसी से यह कहकर आश्रय मांगे कि फ्मुझे अपना पुत्र बनाओय्। यदि स्वीकार कर लिया जाता है तो पुत्र माना जाता है।

यह उल्लेखनीय है कि विवाह की कई प्रणालियां शील भ्रष्टीकरण और बलात्कार की प्रियाक्तियां हैं और कई पुत्रों का अपने पिता से कोई रक्त संबंध नहीं होता था। मनु के समय तक ये विभिन्न प्रकार के विवाह और पुत्र वैध माने जाते थे और मनु ने जो परिवर्तन किए हैं वे मामूली हैं। जहां तक विवाहों का संबंध है मनु ख्2, ने उन्हें अवैध घोषित नहीं किया। उन्होंने मात्र इतना कहा है कि आठ में से प्रथम छह ब्रह्म, देव, आर्ष, प्रजापात्य, असुर, गंधर्व-राक्षस और पिशाच, क्षत्रिय के लिए वैध हैं और

  1. उसमें निषाद भी है। जीमूतवाहन पारासव और निषादों को भिन्न मानता है। पारासव शूद्र कन्या से ब्राह्मण द्वारा उत्पन्न है और निषाद ब्राह्मण द्वारा शूद्र पत्नी से उत्पन्न है।

  2. मनु. 3.23