उन्नीसवीं पहेली: पितृत्व से मातृत्व की ओर-ब्राह्मण इससे क्या लाभ प्राप्त करना चाहते थे? - Page 237

222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तीन-असुर, गंधर्व और पिशाच वैश्य और शूद्र के लिए वैध हैं।

इसी प्रकार वे बारह प्रकार के पुत्रों में से किसी की भी श्रेणी विलग नहीं करता। इसके विपरीत वे उन्हें परिजन स्वीकार करते हैं। उन्होंने मात्र इतना परिवर्तन किया है कि उत्तराधिकार-नियम को बदल दिया है और उनके दो वर्ग कर दिएः 1. उत्तराधि कारी तथा परिजन, और 2. परिजन, किन्तु उत्तराधिकारी नहीं। वह कहते हैं ख्1,

  1. किसी का वैध पुत्र वह है जो उसने अपनी पत्नी से उत्पन्न किया हो, दत्तक पुत्र ही मान लिया गया पुत्र हो, गुह्य पुत्र, और उत्पन्न कराया गया पुत्र हो। यही छह उत्तराधिकारी या परिजन होने के पात्र हैं।

  2. एक अविवाहित किशोरी से उत्पन्न पुत्र, पत्नी के साथ सहवास से प्राप्त पुत्र, पुनर्विवाहिता स्त्री से उत्पन्न पुत्र, स्वयं प्राप्त पुत्र और शूद्र स्त्री से प्राप्त पुत्र ऐसे पुत्र हैं, जिन्हें उत्तराधिकार प्राप्त नहीं होता किन्तु सगोत्री हैं।

  3. यदि किसी पुरुष के दो उत्तराधिकारी पुत्र हैं और एक पुत्र उसकी पत्नी से उत्पन्न हुआ है, प्रत्येक (दोनों पुत्रों में से) दूसरे के वंचित हो जाने पर अपने पिता की सम्पत्ति का अधिकारी है।

  4. किसी व्यक्ति का पुत्र ही पैतृक सम्पत्ति का अधिकारी है किन्तु कटुता से बचने के लिए दूसरे को निर्वाह उपलब्ध कराए जाएं।

सगोत्रता विधान का एक और अंग है जिसमें बहुत परिवर्तन किए गए हैं किन्तु जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं गया। वह है बालक का वर्ण निर्धारण। बालक का वर्ण क्या हो? उसे पिता का वर्ण मिलता है या माता का। मनु से पूर्व पिता का माना जाता था, माता के वर्ण का कोई महत्व नहीं था। इस संबंध में कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो इस शोध की पुष्टि करते हैं।

पिता माता बालक

नाम वर्ण नाम वर्ण नाम वर्ण

  1. शांतनु क्षत्रिय गंगा अज्ञात भीष्म क्षत्रिय

  2. पराशर ब्राह्मण मत्स्यगंधा मछेरा कृष्णद्वैपायन ब्राह्मण

  3. वशिष्ठ ब्राह्मण अक्षमाला µ पायन µ

  4. शांतनु क्षत्रिय मत्स्यगंधा मछेरा विचित्रवीर्य क्षत्रिय

  5. विश्वामित्र क्षत्रिय मेनका अप्सरा शकुंतला क्षत्रिय

  6. ययाति क्षत्रिय देवयानी ब्राह्मण यदु क्षत्रिय

  7. ययाति क्षत्रिय शर्मिष्ठा आसुरी द्रुह्य क्षत्रिय

  8. जरत्कारु ब्राह्मण जरत्कारी नाग आस्तीक ब्राह्मण

  9. मनु. 9.159-60ः 162-63ः पृ., 359-60