उन्नीसवीं पहेली: पितृत्व से मातृत्व की ओर-ब्राह्मण इससे क्या लाभ प्राप्त करना चाहते थे? - Page 238

उन्नीसवीं पहेली

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मनु क्या करते हैं? संतान के वर्ण-निर्णय संबंधी विधान में मनु के परिवर्तन क्रांतिकारी हैं। मनु ख्1, ने निम्नांकित नियम निर्धारित किएः

  1. फ्सभी वर्णों में वे संतान, जिनका जन्म सहज विवाहित पत्नियों से होता है जो उसी वर्ण की कन्या रही हों, वे उसी वर्ण (जो पिता का है) के माने जाएंगे।य्

  2. फ्द्विज द्वारा उस पत्नी से उत्पन्न संतान, जो एक वर्ण नीचे की हो, वे भी (अपने पिता के समान) वर्ण में गिने जाएंगे भले ही माता के दोष उनमें रहे हों।य्

  3. द्विजों के वे पुत्र, जो एक वर्ण नीचे की पत्नियों से उत्पन्न होंगे, जिनको उसी क्रम में गिना गया है, मातृ दोष के कारण अनन्तर (एक वर्ण नीचे) समझे जायेंगे।य्

  4. फ्(आर्यों से) उत्पन्न छह पुत्र, जो समान अथवा एक वर्ण नीचे की पत्नियों से जन्मेंगे, उनके कर्त्तव्य द्विजों के समान होंगे परन्तु जिनका जन्म नियमोल्लंघन से होता होगा, कर्त्तव्य के संबंध में वे शूद्रवत होंगे।य्

मनु ने निम्नांकित भिन्नताएं नियत की हैंः

  1. जहां पिता और माता समान वर्ण के हों।

  2. जहां माता का वर्ण पिता से एक वर्ण निम्न हो जैसे ब्राह्मण पिता, क्षत्रिय माता क्षत्रिय पिता, वैश्य माता और वैश्य पिता और शूद्र माता।

  3. जहां माता का वर्ण पिता से एकाधिक वर्ण नीचे हो जैसे ब्राह्मण पिता और वैश्य अथवा शूद्र माता, और क्षत्रिय पिता तथा शूद्र माता।

पहली श्रेणी में संतान का वर्ण पिता का वर्ण होगा। दूसरी श्रेणी में भी पिता का वर्ण ही मिलेगा। परन्तु तीसरी श्रेणी में उन्हें पितृ नहीं मिलेगा। मनु ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि पिता का वर्ण नहीं मिलेगा तो फिर कौन सा वर्ण मिलेगा? परन्तु मनु के सभी भाष्यकार मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट, नारद और नंदपण्डित कहते हैं यह स्पष्ट है कि ऐसी संतानों को माता का वर्ण दिया जाएगा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि मनु ने पितृवर्ण को मातृवर्ण में परिवर्तित कर दिया।

यह एक महान क्रांतिकारी परिवर्तन है। यह एक दुखद स्थिति है कि जिसे बहुत कम लोग समझ पाए हैं कि प्रचलित विवाह पद्धतियां, पुत्रों की श्रेणियां, अनुलोम विवाह और पितृ वर्ण के सिद्धांत का औचित्य, वर्ण व्यवस्था जबकि ब्राह्मणों की इच्छा थी कि वह बंद पद्धति रहे एक मुक्त व्यवस्था बनी रही। कहा जाए तो वर्ण-व्यवस्था में अनेक छिद्र थे। वर्ण-व्यवस्था से विवाह पद्धतियों का कोई संबंध नहीं था। राक्षस और पिशाच विवाहों में, विवाह की हर संभावनाओं के परिपेक्ष्य में पुरुष निम्न वर्ण के थे और स्त्रियां उच्च वर्ण से संबंधित थीं।

पुत्रत्व विधान में भी अत्यंत दोष थे क्योंकि शूद्रों के पुत्र ब्राह्मण बन सकते थे। उदाहरणार्थ, गुह्यज, सहोदज, कानीन। कौन कहता है कि ये शूद्र से अथवा ब्राह्मण से क्षत्रिय या वैश्य से उत्पन्न हुए हैं? ये सन्देह अनुलोम प्रथा से संभव थे, जिसमें यह कानूनी मान्यता थी जो पितृवर्ण प्रथा से संबद्ध थी, जिसके अनुसार यह गुंजायश थी कि निम्न वर्ण के व्यक्ति उच्च वर्ण में आ जाएं। कोई शूद्र कभी ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा

  1. मनु, अध्याय 10, श्लोक 5, 6, 14 और 41 पृ. 402, 403, 404 और 412