224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वैश्य नहीं बन सकता था किन्तु किसी शूद्र स्त्री की संतान वैश्य बन सकती थी यदि वैश्य का उससे विवाह हो जाता। इसी प्रकार वह संतान क्षत्रिय और ब्राह्मण भी बन सकती थी यदि उसकी शादी क्षत्रिय या ब्राह्मण से संपन्न हो जाती। निम्न श्रेणी का उच्च श्रेणी में मिश्रण या संमिलन एक सकारात्मक और विश्वसनीय प्रक्रिया थी चाहे वह अप्रत्यक्ष माध्यम से ही क्यों न हो? यह प्राचीन व्यवस्था का परिणाम था। इसके दूसरे परिणाम थे। यह थे कि किसी वर्ण के व्यक्ति मिश्रित और समुच्चय समुदाय बन जाते थे। ब्राह्मण वर्ग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समुदाय की स्त्रियों से उत्पन्न संतानें हो सकती थीं और उन्हें ब्राह्मणों को प्राप्य अधिकार प्राप्त थे। क्षत्रिय समुदाय में क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र स्त्रियों से उत्पन्न संतानें हो सकती थीं और उन्हें क्षत्रियों के अधिकार प्राप्त होते थे। इसी प्रकार वैश्य समुदाय में वैश्य तथा शूद्र स्त्रियों से उत्पन्न संतानें वैश्य समझी जाती थीं और उन्हें वही अधिकार प्राप्त थे।
मनु ने जो परिवर्तन किए, वह हिन्दुओं के मौलिक आदर्शों के विरुद्ध थे। पहली बात तो यह है कि यह हिन्दुओं के क्षेत्र-क्षेत्रज विधान का ही विरोध करता है। इस विधान के अनुसार, जो संतान सम्पत्ति अधिकार से संबंधित है, कहा गया है कि संतान का अधिकारी मात्र औपचारिक पति है वास्तविक पिता नहीं। वह इस बात को ऐसे कहते हैं ख्1, ः
इस प्रकार वे पुरुष, जिनका किसी स्त्री से वैवाहिक संबंध नहीं है, परन्तु किसी ऐसी स्त्री के गर्भ में उनका बीज है जो किसी अन्य की पत्नी है तो संतान पर पति का अधिकार होगा। परन्तु वह उससे कोई लाभ नहीं उठा सकता। जब तक क्षेत्र के स्वामी और बीज डालने वाले के बीच कोई सहमति न हो। स्पष्ट रूप से जमीन का स्वामी पिता है, क्योंकि भूमि का महत्व बीज से अधिक है।
यही कारण है कि बारह प्रकार के पुत्रों का अधिकार नियत किया गया।
यह परिवर्तन निर्धारित नियम के विरुद्ध था। हिंदू परिवार रोम की भांति पितृ सत्तात्मक हैं। दोनों समाजों में पिता को परिवार के सदस्यों पर अधिकार है। मनु इससे अवगत थे और उसकी अधिक दशाओं को स्वीकार कर लिया। हिंदू पिता के अधि कारों की परिभाषा करते हुए मनु कहते हैंः
तीन व्यक्ति, पत्नी, पुत्र और दास सामान्यतः किसी सम्पत्ति के स्वामी नहीं हो सकते। जो सम्पत्ति उन्होंने अर्जित की हो, उसका भी स्वामी वही है जिससे वे सम्बद्ध हैं।
वह परिवार के प्रमुख की हैµअर्थात् पिता की। यह नियम भी था कि पिता पुत्र द्वारा अर्जित सम्पत्ति का स्वामी है। पितृत्व सत्तात्मक विधान में परिवर्तन का अर्थ है पिता की निश्चित हानि।
मनु ने पितृ-सावर्ण्य को मातृ-सावर्ण्य में क्यों परिवर्तित किया?
- मयने - हिन्दू ला, पृ. 83