बीसवीं पहेली
कलि वर्ज्य अथवा पाप को पापकर्म घोषित किए
बिना स्थगन की ब्राह्मणवादी कला
ब्राह्मणों की कलिवर्ज्य नामक हठधर्मी बहुत कम लोगों को ज्ञात है। कलियुग को अन्य ब्राह्मणवादी हठधर्म से इसको भ्रमित नहीं करना चाहिए।
कलिवर्ज्य की हठधर्मी में कुछ प्रथाओं और व्यवहारों को गिनाया गया है जो अन्य युगों में व्यावहारिक थीं लेकिन कलियुग में उनके अनुपालन पर पाबंदी है। इन अनुदेशों के प्रसंग विभिन्न पुराणों में यत्र-तत्र उपलब्ध हैं, परन्तु आदित्य पुराण में उन्हें संहिताबद्ध ख्1, करके संग्रहीत कर दिया गया है। कलिवर्ज्य प्रथाएं निम्नांकित हैंः
विधवा से पुत्र उत्पन्न करने हेतु पति के भाई की नियुक्ति।
किसी (विवाहित) स्त्री का पुनर्विवाह (उसका जिसका विवाह पक्का नहीं
हुआ) (अथवा उसका जिसका विवाह पक्का हो गया था) दूसरे पति के
साथ प्रथम पति की मृत्यु के उपरांत।
तीनों द्विज वर्णों के बीच अन्य वर्णों की कन्याओं से विवाह।
आततायी ब्राह्मण का सीधे युद्ध में भी वध।
किसी द्विज से व्यवहार (उसके साथ खान-पान जैसा व्यवहार) जो समुद्र
यात्रा पर जाता है, चाहे उसने प्रायश्चित भी क्यों न कर लिया हो?
सात्र का उपनयन कराना।
जल हेतु कमण्डल लेकर चलना।
लम्बी यात्रा पर जाना।
मैंने उन्हें महामहोपाध्याय काणे के पेपर से लिया है।
यह नौ पृष्ठों का टंकित आलेख है। लेखक ने अनेक संशोधन किए हैं। कलिवर्ज्य पर सभी टिप्पणियां इस भाग के परिशिष्ट में हैं। - संपादक