पहली पहेली
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पथ ही नहीं है। जो हिंदू समझे जाते हैं, उनके विश्वास एक-दूसरे से अत्यंत भिन्न हैं, अपेक्षाकृत ईसाईयों और मुसलमानों के। हिंदुओं की मूल धार्मिक आस्थाएँ भी भिन्न-भिन्न हैं कुछ कहते हैं कि सभी हिंदू-शास्त्र उन्हें स्वीकार्य हैं परन्तु कुछ हिंदू तंत्रों का तिरस्कार करते हैं। कुछ लोग वेदों को प्रमुखता से मानते हैं तो दूसरों को कर्मवाद और पुनर्जन्म में गहरी आस्था है।
पंथों और सिद्धांतों का मिश्रित समूह ही हिन्दुत्व है। इसकी छत्रछाया में पलते हैं एकेश्वरवाद, बहुदेववाद और सर्वेश्वरवाद_ महान देवता शिव और विष्णु के उपासक अथवा उनके नारी प्रतिरूप, साथ ही दैवी मातृ शक्तियों, वृक्षों, चट्टानों और जल-धाराओं में बसी हुई आत्माओं और संरक्षक ग्राम्य देवताओं के उपासक हैं_ ऐसे व्यक्ति, जो अपने देवताओं को सर्व प्रकार की बलि देते हैं, और ऐसे व्यक्तियों को, जो अहिंसक हैं और जिन्हें ‘‘वध’’ शब्द से ही घृणा है, जिनके धार्मिक अनुष्ठानों में मात्र प्रार्थनाएं और मन्त्रोच्चारण सम्मिलित हैं, और ऐसे भी हैं जो धर्म के नाम पर अकथनीय आडंबरों में लिप्त हैं और इसमें उनका बहुल्य है, जो कुल मिलाकर शास्त्रद्रोही है और उनमें से कई तो ब्राह्मणों की सत्ता नकारते हैं, अथवा कम से कम उनके धर्माचार्य गैर-ब्राह्मण हैं।
यदि कोई यह कहता है कि वह अन्य हिंदुओं के समान रीति-रिवाज अपनाता है, इसलिए वह हिंदू हैं तो भी झूठ है क्योंकि सभी हिंदुओं के रीति-रिवाज एक समान नहीं हैं।
उत्तर भारत में सपिण्डगोत्र में विवाह की प्रथा नहीं है। परन्तु दक्षिण में मामा-भांजी और मामा-फूफी आदि के बहन-भाइयों में वैवाहिक संबंध प्रचलित हैं। नारी के सतीत्व के नियमों के संबंध में सर्वोच्च मान्यताएं हैं। कुछ जातियों में इसमें अत्यंत ढील दी जाती है, विशेष रूप से विवाह पूर्व। कहीं-कहीं यह भी चलन है कि लोग अपनी कन्या को धार्मिक कदाचार के लिए समर्पित कर देते हैं। कुछ क्षेत्रों में नारी स्वतंत्र है तो कहीं-कहीं पर्दानशीन है। कुछ स्थानों पर वे लहंगा पहनती हैं तो कहीं सलवार आदि।
यदि वह यह कहता है कि वह इसलिए हिंदू है कि वह जातिप्रथा को मानता है, उसका यह उत्तर भी संतोषजनक ढंग से स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह बिल्कुल सत्य है कि किसी हिंदू को इस बात से कोई गरज नहीं कि उसके पड़ोसी की क्या आस्थाएं हैं, पर यह जानना उसका परम धर्म है कि वह उसके साथ खान-पान कर सकता है या, नहीं। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ यह हुआ कि जातिवाद हिंदू धर्म की आत्मा है और जो व्यक्ति किसी मान्यताप्राप्त हिंदू जाति से संबद्ध नहीं है, वह हिंदू हो