10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ही नहीं सकता। यही इतिश्री नहीं है। उनकी मात्र जात-पांत में आस्था ही पर्याप्त नहीं है। जात-पांत तो ईसाईयों और मुसलमानों में भी दीमक की तरह घुसी है। खान-पान में बेशक न हो। शादी-व्यवहार में तो वह सर्वव्यापी है। परन्तु इसी कारण वे हिंदू नहीं कहलाते। उनमें दोनों बातों का होना आवश्यक है। उसे हिंदू होना चाहिए और जात-पांत में विश्वास रखना चाहिए। अब फिर वही प्रश्न उठता है कि हिंदू कौन है? इस संदर्भ में हम जहाँ के तहां खड़े हैं।
क्या प्रत्येक हिंदू के समक्ष यह प्रश्न नहीं है कि उसके अपने धर्म के बारे में इतनी ऊहापोह क्यों है? इतनी उलझन क्यों है? वह ऐसे मामूली जवाब क्यों नहीं देता_ जिनका उत्तर प्रत्येक पारसी, प्रत्येक ईसाई और प्रत्येक मुसलमान के पास है। क्या यह समय नहीं है कि वह आत्मावलोकन करे कि क्या कारण है, जिनके फलस्वरूप यह धार्मिक अव्यवस्था उत्पन्न हुई है?