बीसवीं पहेली
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- ब्राह्मण गृहस्थ का अपने शूद्र वर्ण के दास के हाथ से बना भोजन ग्रहण
करना, गोशाला में और उन व्यक्तियों के हाथ का भोजन करना जो बटाई
पर उसकी खेती करते हैं।
बहुत लम्बी तीर्थ यात्रा पर जाना।
गुरु पत्नी के साथ वैसा व्यवहार जैसा स्मृतियों में गुरु के लिए निर्धारित
है।
- ब्राह्मण द्वारा विपरीत परिस्थितियों में गलत कार्यों द्वारा जीवनयापन के लिए
कल के लिए भोजन की परवाह न करना।
- जातकर्म होम के समय ब्राह्मण द्वारा अरनी (अग्नि उत्पन्न करने के लिए
दो लकडि़यों के खण्ड) स्वीकार करना जिसके अनुसार शिशु के जातकर्म
से उसके पाणिग्रहण तक के संस्कार कराने का कार्यक्रम हो। 33. ब्राह्मण द्वारा सतत यात्रा।
- बांस निर्मित फूंकनी के बिना आग में मुंह से फूंक मारना।
- शास्त्रों में वर्णित प्रायश्चित के पश्चात् भी किसी ऐसी स्त्री को जाति में
सम्मिलित होने की स्वीकृति देना जो बलात्कार से कलंकित हो चुकी हो। 36. संन्यासी द्वारा सभी वर्णों (शूद्रों सहित) से भिक्षा ग्रहण करना। 37. जमीन से निकाने जाने वाले जल का पान करने हेतु दस दिन तक
प्रतीक्षा।
अध्यापक को दीक्षांत पर (मांगने पर) शास्त्रानुसार दक्षिणा।
ब्राह्मण और अन्यों के लिए शूद्रों से भोजन बनवाना।
वृद्धों द्वारा चट्टान से अथवा आग में कूदकर आत्महत्या।
झूठे पानी का सम्मानित व्यक्तियों द्वारा आचमन, चाहे वह गाय का ही झूठा
क्यों न हो?
- पिता और पुत्र के मध्य झगड़े में साक्षी को दंडित करना।
- संन्यासी जहां रात हो जाए, वहीं शयन करे।
इस कलिवर्ज्य संहिता के विषय में यह आश्चर्य की बात है कि इसके महत्व को पूर्ण समझा नहीं गया। इसे उन वर्जित कार्यों की सूचीमात्र समझा गया जो कलियुग में निषिद्ध हैं। परन्तु वर्जित कार्यों की सूची के पीछे और कुछ भी है। इसमें संदेह नहीं है कि कलिवर्ज्य संहिता में अनेक कार्यों के लिए वर्णन है। परन्तु प्रश्न यह