परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 244

परिशिष्ट- I

वर्णाश्रम धर्म की पहेली

वर्ण धर्म और आश्रम धर्म के दो मताग्रहों की ओर पहले ही ध्यान दिलाया जा चुका है, जिन दोनों से मिलकर वर्णाश्रम धर्म बनता है और जो हिंदुत्व का मूल आधार है। इन अजीब सिद्धांतों पर प्राचीन लेखकों के क्या विचार हैं? मैं उन पर प्रकाश डालने से नहीं रह सकता।

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पहले वर्ण धर्म से प्रारंभ करते हैं। यह उचित होगा कि वेदों में प्रकट किए विचारों को सर्वप्रथम एक स्थान पर एकत्रित किया जाए।

इस विषय पर ऋग्वेद के दसवें मंडल में 90 वें मंत्र को देखना है। वह इस प्रकार हैः

  1. फ्पुरुष के एक सहस्र शीश हैं, एक सहस्र चक्षु, एक सहस्र चरण। वह सर्वत्र परिपूर्ण व्यापक है। उसने दस अंगुलियों से हर ओर से समस्त भूमंडल को आच्छादित कर रखा है।य् 2. फ्पुरुष स्वयं सम्पूर्ण (ब्रह्मांड) है, जो वर्तमान है, जो भावी है। वह अविनाशी स्वामी है। भोजन से उसका विस्तार होता है। 3. उसकी समानता ऐसी है और पुरुष सर्वश्रेष्ठ है। सारी सृष्टि उसका क्षेत्र है और उसका तीन चौथाई अविनाशी अंश अंतरिक्ष में है। 4. पुरुष का तीन चौथाई अंश उर्ध्व है, उसका एक चौथाई अंश यहां पुनः विद्यमान है। फिर उसका सर्वत्र विलय हो गया। उन सभी पदार्थों में जो भक्षण करती हैं और भक्षण नहीं करती। 5. उससे विराज उत्पन्न हुआ और विराज से पुरुष। जन्म लेते ही वह धरती से आगे बढ़ गया आगे भी और पीछे भी। 6. जब देवों ने पुरुष की आहुति से यज्ञ किया तो वसंत उसका घी था ग्रीष्म लकड़ी और शरद समिधा। 7. यह बलि पुरुष जो सर्वप्रथम जन्मा उन्होंने बलि घास पर जला दिया।

  2. यह पहेली 16-17 का मिला-जुला परिशिष्ट है जिसका शीर्षक है फ्वर्णाश्रम धर्मय्। इसको मूल अनुक्रमणि् ाका में सम्मिलित नहीं किया गया है, इसलिए इसे परिशिष्ट में रखा गया है। यह कहना कठिन है, कौन-सा पाठ बाद का है। दोनों पाठों में उद्धरण पहले नहीं गये हैं जबकि कई भाष्य बदले गए हैं। यह 55 पृष्ठों का आलेख है। इनमें लेखक के संशोधन नहीं हैं। - संपादक