230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उसके साथी देवताओं साध्यों और ऋषियों ने आहुति दी। 8. इस ब्रह्मांड यज्ञ से दही और मक्खन उपलब्ध हुए। इससे वे नभचर और थलचर बने जो वन्य और पालतू हैं। 9.ब्रह्मांड यज्ञ से ऋग्वेद और सामवेद की ऋचाएं निकलीं, छंद और यजुस निकले। 10. उससे अश्व जन्में और दोनों जबड़ों वाले सभी पशु जन्मे, मवेशी जन्मे और उसी से अजा मेष जन्मे। जब (देवों ने) पुरुष को कितने भागों में काटकर विभाजित कर दिया। उसका मुख्प क्या था। उसकी कितनी भुजाएं थीं। (कौन से दो तत्त्व) उसकी जंघाएं और चरण बताई गई हैं। 12. ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्य उसकी भुजाएं बनी, जो वैश्य (बना) वह उसकी जंघाएं थीं, शूद्र उसके पैरों से उत्पन्न हुए। 13. उसकी आत्मा (मानस) से चन्द्रमा, उसके चक्षु से सूर्य, उसके मुख से इन्द्र और अग्नि, उसके श्वास से वायु बनी। 14. उसकी नाभि से मारुत बनी, उसके शीर्ष से आकाश बना, उसके चरणों से धरती, उसके कर्ण से दिशाएं और इस प्रकार विश्व बना। 15. जब देवता यज्ञ कर रहे थे, उन्होंने पुरुष को एक बलि-जीव के रूप में बांधा। इसके लिए सात डंडिया अग्नि के चारों ओर थी और तीन बार लकडि़यों की सात टुकड़ों की समिधा चढ़ाई गई। 16. इस यज्ञ में देवताओं ने आहुति दी। यह प्रथम अनुष्ठान था। इन शक्तियों ने आकाश से कहा पूर्व साध्यगण, कहां है?य्
इस मंत्र वृंद का सर्वविदित नाम पुरुष सूक्त है और यह जाति और वर्ण व्यवस्था का शास्त्रीय सिद्धांत माना जाता है।
सर्वप्रथम यह जांच करनी है कि अन्य किस वेद में वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति ऋग्वेद के पुरुष सूक्त की भांति मानी गयी है? अलग-अलग वेदों के मत का अनुशीलन करने पर आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैंः
सामवेद की ऋचाओं में पुरुष सूक्त सम्मिलित नहीं किया गया है और न उसमें वर्ण-व्यवस्था की कोई व्याख्या दी गयी है।
यजुर्वेद में इस संबंध में अत्यधिक मतातर है। अब हम श्वेत यजुर्वेद का प्रश्न लेते हैं और कृष्ण यजुर्वेद की अपेक्षा अलग से अध्ययन करते हैं तो दोनों की तुलना हम तीन संहिताओं के आधार पर करते हैं। इसकी तीन संहिताओं, कठ संहिता और मैत्रायणी संहिता में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का कोई उल्लेख नहीं है और न उसने वर्ण-व्यवस्था की कोई अन्य व्याख्या दी है। मात्र वाजसनेयी संहिता ही यजुर्वेद की ऐसी संहिता है, जिसके मंत्रों में बिना किसी अन्तर के पुरुष सूक्त यथावत् सम्मिलित किया गया है परन्तु वाजसनेयी संहिता में एक नई और मौलिक व्याख्या दी गई है, जो पुरुष सूक्त से नितांत भिन्न है। पुरुष सूक्त में निम्नांकित ख्1, हैः
- म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ.18