परिशिष्ट- I
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फ्उसने एक के साथ स्तुति की। प्राणी बने। प्रजापति राजा थे। उन्होंने तीन के साथ स्तुति की। ब्राह्मण की रचना हुई। ब्राह्मणस्पति राजा थे। उन्होंने पांच के साथ स्तुति की, विद्यमान पदार्थ उत्पन्न हुए। भूतानामपति राजा थे। उन्होंने सात के साथ स्तुति की, सप्तऋषि उत्पन्न हुए। धात्री राजा थे। उन्होंने नौ के साथ स्तुति की, पितृगण उत्पन्न हुए। अदिति राजा थे। उन्होंने ग्यारह के साथ स्तुति की, ऋतुएं उत्पन्न हुईं। आर्तव राजा थे। उन्होंने तेरह के साथ स्तुति की, मास उत्पन्न हुए। वर्ष राजा था। उन्होंने पंद्रह के साथ स्तुति की, क्षत्रिय उत्पन्न हुआ। इन्द्र राजा थे। उन्होंने सत्रह के साथ स्तुति की, पशु उत्पन्न हुए। बृहस्पति राजा थे। उन्होंने उन्नीस के साथ स्तुति की, शूद्र और आर्य (वैश्य) उत्पन्न हुए। दिवस और रात्रि शासक थे। उन्होंने इक्कीस के साथ स्तुति की, अविभाजित सूंड धारी पशु उत्पन्न हुए। वरुण राजा थे। उन्होंने तेईस के साथ स्तुति की, लघु पशु उत्पन्न हुए। पूशान राजा थे। उन्होंने पच्चीस के साथ स्तुति की, वन्य जीव उत्पन्न हुए। वायु राजा थे (ऋ.वे. 10.90.8)_ उन्होंने सत्ताईस के साथ स्तुति की, धरती और स्वर्ग विलग हुए। वसु, रुद्र और आदित्य उनसे विलग हो गए वे राजा थे। उन्होंने उन्तीस के साथ स्तुति की, वृक्ष उत्पन्न हुए। सोम राजा थे। उन्होंने इक्तीस के साथ स्तुति की, प्राणी उत्पन्न हुए। मास के पक्ष राजा थे। उन्होंने इक्तीस के साथ स्तुति की, विद्यमान पदार्थ शांत हो गए, प्रजापति परमेष्ठी राजा थे।य्
अब कृष्ण यजुर्वेद पर आते हैं। इसमें केवल एक संहिता उपलब्ध है। यह तैत्तिरीय संहिता कहलाती है। इसमें दो व्याख्याएं हैं। प्रथम व्याख्या ख्2, यह है जो वाजसनेयी संहिता में मूल रूप में दी गई है। दूसरी व्याख्या इसकी अपनी है और यह वाजसनेयी संहिता में उल्लिखित नहीं है। यह इस प्रकार हैः
फ्वह वृत्य भावावेश से भर उठा तब राजन्य प्रकट हुआ।य्
फ्जिसके घर यह जाने वाला वृत्य अतिथि रूप में आता है, उसे वह (राजा) स्वयं से श्रेष्ठ जानकर उसका सम्मान करे। ऐसा करके वह राजपद अथवा अपनी सत्ता पर आघात नहीं करता। उससे ब्राह्मण प्रकट हुआ और क्षत्रिय भी। उन्होंने कहा हम किसमें प्रवेश करें आदि।य्
महत्वपूर्ण बात यह है कि वाजसनेयी संहिता में ऋग्वेद का पुरुष सूक्त सन्निहित है जबकि तैत्तिरीय संहिता में इसका उल्लेख हटा दिया गया है।
खंड 4 देखें, प्रपाठक 3, श्लोक 10
वही 1, पृ. 22