232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अथर्ववेद में पुरुष सूक्त है किन्तु मंत्रों का क्रम ऋग्वेद से भिन्न है। बल्कि यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता और तैत्तिरीय संहिता की भांति अथर्ववेद पुरुष सूक्त से समतुल्य नहीं है। इसकी दूसरी व्याख्या है। उतनी पूर्ण और सर्वमान्य नहीं, जैसा पुरुष सूक्त है, किन्तु इसकी अपनी विशेषता है ख्1, ः
फ्सर्वप्रथम ब्राह्मण उत्पन्न हुआ। उसके दस सिर और दस मुख थे। उसने सर्वप्रथम सोम पान किया, उसने शिव को प्रभावहीन किया।
देवता राजन्य से भयभीत थे, जो गर्भ में था। जब वह गर्भ में था, उन्होंने उसे बंधन युक्त कर दिया। परिणामस्वरूप यह राजन्य बंधनयुक्त उत्पन्न हुआ। यदि वह अजन्मा निर्बंध होता तो वह अपने शत्रुओं का वध करता। राजन्य, कोई अन्य, जो चाहे कि वह बंधन मुक्त उत्पन्न हो और अपने शत्रुओं का हनन करता रहे तो वह ऐन्द्र-ब्राह्स्पत्य आहुतियां दे। राजन्य के लक्षण इन्द्र जैसे हैं और ब्राह्मण बृहस्पति है। ब्राह्मण के माध्यम से ही कोई राजन्य को बंधनमुक्त कर सकता है। स्वर्णबंध, एक उपहार, स्पष्ट रूप से उसे बेडि़यों से मुक्त करता है।य्
मात्र पुरुष सूक्त ही चार वर्णों की उत्पत्ति की व्याख्या ही नहीं करता बल्कि वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति की ओर इंगित करता है जो वेदों में पायी जाती है। एक अन्य व्याख्या उन व्यक्तियों का उल्लेख करती है जो मनु की संतति हैं ख्2, ः उनका निम्नांकित उद्धरण में उल्लेख हैः
फ्प्रार्थनाएं और मंत्र पहले इन्द्र की उपासना में उस उत्सव में संकलित हुए जिसे अर्थवन, पिता मनु और दधीचि ने सुशोभित किया।य्
फ्हे रुद्र! यज्ञ से संकटमोचन पिता मनु ने जो सम्पदा ग्रहण की, तेरे निर्देश में हमें वही सब प्राप्त हो।य्
फ्जो प्राचीन मित्र दैवी शक्ति से सम्पन्न था। पिता मनु ने उसके प्रत देवों की सफलता के प्रवेश द्वार की भांति मंत्र रचे थे।य्
फ्यज्ञ मुन हैं हमारे पालक पिता।य्
फ्हे देवताओ, तुमने हमें उत्पन्न किया, पोषित किया और हमारे प्रति अनुनय किया, हमें पिता मनु के मार्ग से विचलित न करें।य्
फ्वह (अग्नि) जो मनु की संतति के बीच देवताओं के उद्बोधक स्वरूप निवास करता है, वह इनका भी स्वामी है।य्
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 21-2
वही, पृ. 162-165