परिशिष्ट- I
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फ्अग्नि, देवताओं और मनु की संतान सहित मंत्रोच्चार से विविध यज्ञ कर रहे हैं।य्
फ्तुम देव, बज और ऋभुगणों जैसे देवों को प्रसन्न करते हो, मानुष की संतति के बीच शुभ दिन देवताओं के मार्ग से हमारे यज्ञ में आओ।य्
फ्मानव गण ने यज्ञ में अग्नि उद्बोधक की स्तुति की।य्
फ्लोक स्वामी अग्नि ने जब भी कृतज्ञ मानव के आवास की प्रदीप्त कया, उसने राक्षस गण को मार भगाया।य्
अब हम ब्राह्मण साहित्य पर आएं और देखें कि इस प्रश्न पर वे क्या कहते हैं?
शतपथ ब्राह्मण की व्याख्या इस प्रकार है ख्1, ः
फ्प्रजापति ने फ्भूय् जपते हुए यह पृथ्वी बनाई, फ्भुवःय् के साथ वायु बनाई, फ्स्वाहाय् के साथ आकाश बनाया। ब्रह्मांड का इस संसार से सह-अस्तित्व है। अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। फ्भूय् कहकर प्रजापति ने ब्राह्मण उत्पन्न कया फ्भुवःय् से क्षत्रिय, फ्स्वाहाय् से विष बनाया अग्नि सर्वत्र व्याप्त है। फ्भूय् कहकर प्रजापति ने स्वयं को उत्पन्न किया, भुवः कहकर संतति रची फ्स्वाहाय् से पशु उत्पन्न किए। यह शिव स्व, संतति और पशु है। अग्नि सर्वत्र व्याप्त है।य्
इसी शतपथ ब्राह्मण की ही एक अन्य व्याख्या है। यह निम्नांकित हैः
फ्ब्रह्मा (यहां व्याख्याकार के अनुसार वह अग्नि स्वरूप है और ब्राह्मण वर्ग का रूप है) पहले यह एक मात्र (ब्रह्मांड) थे। एक रहते उनकी वृद्धि नहीं हुई। उन्होंने शक्ति से एक श्रेष्ठ क्षेत्र उत्पन्न किया अर्थात् देवताओं में वे जिनमें शक्ति है (क्षत्राणी) इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, पारजन्य, यम, मृत्यु, ईशान। इस प्रकार क्षात्र से श्रेष्ठ कोई नहीं। इसलिए ब्राह्मण राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय से नीचे बैठते हैं। वह क्षत्रिय की गरिमा स्वीकार करता है। ब्रह्मा, क्षत्रिय का उद्गम है। इस प्रकार यद्यपि राजा की श्रेष्ठता है, अंत में वह उद्गम हेतु ब्राह्मण के आश्रय में जाता है। वह अति दयनीय बन जाता है। उसी के समान जिसकी श्रेष्ठता आहत होती है। 24. उसकी वृद्धि नहीं हुई। उसने विष उत्पन्न किया। देवताओं की इस श्रेणी में वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वदेव, मरुत आते हैं। 25. उसकी वृद्धि नहीं हुई उसने शूद्र वर्ण उत्पन्न किया। यह पृथ्वी पूशान है। सो वह सभी का पोषण करती है। 26. उसकी वृद्धि नहीं हुई उसने शक्ति से एक वलक्षण रूप उत्पन्न किया न्याय (धर्म) यह शासक है (क्षात्र) अर्थात् न्याय। इस प्रकार न्याय से श्रेष्ठ कुछ नहीं। इसलिए निर्बल बलवान से त्राण को न्याय मांगता है जैसे एक राजा से। यह न्याय सत्य है।
म्यूर, द्वारा उद्धृत, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 17
संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 20