परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 249

234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति के विषय में वे कहते हैंः फ्यह सत्य बोलता है, क्योंकि उसमें दोनों गुण हैं।य् 27. यह ब्रह्म क्षात्र, विज और शूद्र हैं।

फ्अग्नि के माध्यम से देवताओं में वह ब्रह्मा बन जाता है, मनुष्यों में ब्राह्मण, (दैवी) क्षत्रिय के माध्यम से (मनुष्य) एक क्षत्रिय, दैवी वैश्य के माध्यम से एक (मनुष्य) वैश्य। दैवी शूद्र के माध्यम से एक (मनुष्य) शूद्र बनता है। अब वह देवों में अग्नि और मनुष्यों में ब्राह्मण है।य्

तैत्तिरीय ब्राह्मण में निम्नांकित व्याख्याएं हैं। प्रथम इस प्रकार है ख्1,

फ्यह समस्त (ब्रह्मांड) ब्रह्मा द्वारा रचित है। मनुष्य कहते हैं कि वैश्य ऋव्Q ऋचाओं से बना है। वे कहते हैं, यजुर्वेद के गर्भ से क्षत्रिय उत्पन्न हुआ है। सामवेद से ब्राह्मण प्रकट हुआ। यह शब्द प्राचीन है घोषित प्राचीन।य्

द्वितीय संदर्भ में मात्र दो वर्ण हैं- केवल ब्राह्मण और शूद्र उसके अनुसार ख्2,

फ्ब्राह्मण वर्ण देवों से प्रकट हुआ, शूद्र असुरों से।य्

शूद्रों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में तीसरी व्याख्या निम्न प्रकार है ख्3,

फ्वह शुष्क भोजन से स्वेच्छा से दुग्ध की आहुति दे। शूद्र दुग्ध की आहुत न दे, क्योंकि शूद्र शून्य से जन्मा है। वे कहते हैं, जब शूद्र दूध चढ़ाता है, वह आहुति नहीं है। शूद्र अग्निहोत्र में दूध से आहुति न दे क्योंकि वे इसे शुद्ध नहीं करते। जब उसे छान लिया जाय, तब यह आहुति है।’’

अगली बात यह देखनी है कि वर्ण-व्यवस्था के सम्बन्ध में स्मृतयों की क्या व्याख्या है, उसका ज्ञान आवश्यक है। मनु ने अपनी स्मृति ख्4, में इस संबंध में क्या कहा हैः

फ्उसने (स्वयंभू) इच्छा करके और अपनी देह से विभिन्न जीवों की रचना के मनोरथ से पहले सागर की सृष्टि की और उसमें एक बीज छोड़ दिया।

  1. बीज सहस्रों सूर्यों के समान प्रकाश वाला, सुवर्ण के समान शुद्ध अंडज हो गया। उसमें सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि करने वाले बह्मा उत्पन्न हुए। 10. जल को फ्नाराःय् कहते हैं क्योंकि वह नर की संतान हैं। वह फ्नारय् परमात्मा का प्रथम निवासस्थान है, इस कारण परमात्मा फ्नारायणय् कहे जाते हैं। 11. वह जो अत्यंत प्रसिद्ध सबका कारण है, नित्य है, सत् तथा असत् स्वरूप है, उससे उत्पन्न पुरुष लोक में ब्रह्मा कहा जाता है। 12. ब्रह्मा ने उस अण्डे में एक वर्ष निवास कर अपने ध्यान के द्वारा उस अंडे के दो टुकड़े कर दिए। 13. फ्कि विश्व में प्राण प्रतिष्ठा हो, उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों की रचना की जो उनके मुख, भुजाओं,

  2. म्यूर, खंड 1, पृ. 17

  3. और 3. म्यूर, संस्कृत टैक्टस, खंड 1, पृ. 21

  4. वही, पृ. 36-37