परिशिष्ट- I
237
(प्रथम की) स्थापित हुई। मातृस्वन ने उत्तर दिया- फ्ब्राह्मण का जन्म ब्रह्मा के मुख से हुआ, उसकी भुजाओं से क्षत्रिय, उसकी जंघाओं से वैश्य जबकि इन तीन वर्णों की सेवा हेतु उसके चरणों से चतुर्थ वर्ण शूद्र उत्पन्न हुआ। जन्मते ही ब्राह्मण धर्म तत्व की रक्षार्थ धरती पर भूतजात का स्वामी बन गया। फिर सृष्टा ने पृथ्वी का शासक क्षत्रिय उत्पन्न किया प्रजा की संतुष्टि को दण्डधारण हेतु द्वितीय यम उत्पन्न किया और ब्रह्मा का आदेश था इन तीन वर्णों को वैश्य धन-धान्य उपलब्ध कराएं और शूद्र सेवा करें।य् तब इला पुत्र ने पूछाः फ्वायु मुझे बताओं अपनी धन-सम्पदा सहित यह पृथ्वी किस के अधिकार में है।, ब्राह्मण के अथवा क्षत्रिय के।य् वायु ने उत्तर दिया, फ्अपनी श्रेष्ठता के आधार पर पृथ्वी पर विद्यमान समस्त सम्पदा का स्वामी ब्राह्मण है, जो कर्तव्य-विधान में पारंगत है। उन्हें यह ज्ञात है, ब्राह्मण जो खाता है, पहनता है, लुटाता है, वह उसी का है। वह सभी जातियों में श्रेष्ठ है, प्रथम जन्मा और सर्वश्रेष्ठ। जिस प्रकार कोई स्त्री अपना पति (पहला) छिन जाने पर अपने देवर जेठ को दूसरा पति बना लेती है, उसी प्रकार विपत्ति में ब्राह्मण पहला आश्रय है और इसके बाद कोई और।य्
महाभारत ख्1, के शांति पर्व में तीसरी व्याख्या दी गई हैः
भृगु ने उत्तर दिया फ्इस प्रकार ब्रह्मा ने पहले अपनी शक्ति से प्रजापतियों के समान भव्य सूर्य और अग्नि को रचा। तब स्वामी ने सत्य, धर्मनिष्ठा, कठोर भक्ति, शाश्वत वेद, गुणकर्म, और स्वर्ग (प्राप्ति हेतु) शुद्धता की पुष्टि की। उसने देवता, दानव, गंधर्व, दैत्य, असुर, महाराग, वक्ष, राक्षस, नाग, पिशाच और मानव ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, साथ ही वर्ण के प्राणी रचे। ब्राह्मण का वर्ण गौर, क्षत्रिय का लाल, वैश्य का पीत और शूद्र का काला बनाया। तब भारद्वाज ने प्रतिवाद कियाः फ्यदि हर जाति के चार वर्ण (रंग) उसका परिचायक हैं तो इससे पहचान में भ्रांति होती है। मनोकामना, क्रोध, भय, लोभ, संताप, कुंठा, भूख, क्लांति हम सब में समान है, तब जाति किससे निर्धारित होती हैं। स्वेद, मूत्र, मल, श्लेष, श्लेष्मा, पित्त और रक्त (सबमें समान हैं) सभी शारीरिक विकार हैं, तब जाति किस से निर्धारित होती हैं। अनगिणत चल और अचल पदार्थ हैं, इनका वर्ण कैसे निर्धारित होता है?
भृगु ने उत्तर दिया, फ्जातियों में कोई अंतर नहीं है।य्
शांति पर्व में ही चौथी व्याख्या ख्2, दी गई है। वह कहती है-भारद्वाज ने फिर पूछा, फ्परमश्रेष्ठ ब्रह्मर्षि, मुझे बताएं वे क्या गुण हैं कि जिनसे कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बन जाता है।य् भृगु कहते हैं- फ्जो शुद्ध है। प्रसव तथा अन्य संस्कारों
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 139-40
वही, पृ. 141-142