परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 253

238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

से पवित्र है, जिसको वेदों का सम्पूर्ण अध्ययन है, छह संस्कारों को सम्पन्न करता है, शुद्धता के अनुष्ठान पूर्णता से सम्पन्न करता है, जो चढ़ावे से बचे पदार्थ ग्रहण करता है, अपने धर्म-गुरु से सम्बद्ध है, सदैव धर्मपरायण है और सत्य को समर्पित है, ब्राह्मण कहलाता है। उसमें सत्य के दर्शन होते हैं। स्वाधीनता, अनाक्रमकता, उपकारिता, सादगी, धैर्य और कठोर भक्ति परिलक्षित हो -- ब्राह्मण हैं। जो राजपद के कर्त्तव्य का पालन करता है, जिसे वेदाध्ययन का व्यसन है और जो लेने और देने से प्रसन्नता अनुभव करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है। वह, जो तत्परता से पशुपालन करता है, जिसकी कृषि कार्यों की लगन है, जो शुद्ध है और वेदों के अध्ययन में पारंगत है, वह वैश्य है। वह, जो हर प्रकार के भोजन का व्यसनी है, सभी कार्य करता हैं, जो अस्वच्छ है, जिसने वेदों का परित्याग कर दिया है, जो पवित्र कर्म नहीं करता, परम्परा से शूद्र कहलाता है और यह (जो मैंने बताया) शूद्र के लक्षण हैं और यह एक ब्राह्मण में नहीं मिलते। (ऐसा) शूद्र शूद्र ही रहेगा। जो ब्राह्मण (जो ऐसा करता है) ब्राह्मण नहीं होगा।य्

आइये, अब यह देखें कि वर्ण-व्यवस्था के संबंध में पुराण क्या कहते हैं?

हम विष्णु पुराण से आरम्भ करते हैं। चातुर्वर्ण्य उत्पत्ति पर विष्णु पुराण में तीन सिद्धांत हैं। एक में यह आरोप मनु के सिर जाता ख्है।, ख्1, विष्णु पुराण का मतः

फ्ऐहिक अण्डज से पूर्व देव ब्रह्मा हिरण्यगर्भ, विश्व के शाश्वत नियंता, जो ब्रह्मा के तत्व रूप थे, जिसमें दिव्य विष्णु सन्निहित थे, जो ऋव्Q, यजुस, साम और अथर्ववेद के रूप में जाने जाते हैं (ही) विद्यमान थे। ब्रह्मा के दाएं अंगुष्ठ से प्रजापति दक्ष उत्पन्न हुए, दक्ष की पुत्री अदिति थी, उससे विवस्वत उत्पन्न हुआ, उससे मनु प्रकट हुआ। मनु के पुत्र थे इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, सावर्ती, नरिष्यंत, प्रमसु, नाभागनिदिष्ट, करुष और पृषध्र, करुष से करुषगण, महाशक्तिवान क्षत्रिय उत्पन्न हुए। निदिष्टा का पुत्र नाभाग वैश्य बना।य्

विष्णु पुराण में एक और भिन्न कथन है। उसके अनुसारः

पुत्र कामना में मनु ने मित्र और वरुण की आहुति दी किन्तु होता के द्वारा मंत्र के गलत उच्चारण कर दिए जाने पर एक पुत्री उत्पन्न हुई। उसका नाम इला था। तब मित्र और वरुण की कृपा से मनु नाम के सुद्युम्न का जन्म हुआ, परन्तु महादेव के कोप के कारण वह भी नारी रूप में परिवर्तित हो गया। वह नारी सोम पुत्र बुध के आश्रम के निकट विचरती रही। बुध उस पर आसक्त हो गया और उन दोनों से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, पुरुरवा। जन्म के उपरांत उस देवता की, जो

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट पृ. 220-21