परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 261

246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दूसरा प्रश्न यह है कि मनु ने व्यक्ति के लिए एक ही क्रम में आश्रम-प्रणाली क्यों रखी? इसमें कोई संदेह नहीं रहा है कि एक समय ऐसा था, जब कोई ब्रह्मचारी तीनों में से कोई-सा भी आश्रम अपना सकता था। वह गृहस्थ बन सकता था अथवा गृहस्थ बने बिना संन्यासी भी बन सकता था। यह तुलना करें कि धर्म-सूत्र इस विषय में क्या कहते हैं? वशिष्ठ धर्म सूत्र का मत है ख्1,

फ्चार सोपान हैंः विद्यार्थी, गृहस्थ, वैखानस और तापस।य्

फ्जिस व्यक्ति ने एक, दो अथवा तीन वेदों का अध्ययन विद्यार्थी धर्म का उल्लंघन किए बिना किया है, वह जिस आश्रम में जीवन बिताना चाहे, बिता सकता है।य्

गौतम धर्म सूत्र ख्2, का मत हैः

फ्कोई (बताए कि) वह (जिसने वेदाध्ययन किया है) किसी भी आश्रम का चयन कर सकता हैय् इसमें चार आश्रम हैंः विद्यार्थी, गृहस्थ, भक्षु, वैखानस।

मनु ने विकल्प को तिरोहित करके गृहस्थ को अनिवार्य क्यों बनाया? उसे गृहस्थ को बैखानस से पूर्व की शर्त क्यों बनाया और बैखानस को संन्यास से पूर्व की शर्त क्यों रखा?

महत्वपूर्ण लक्ष्य के लिए जीवन के चार चरणों की आवश्यकता कर दी गई है। यह समझना कठिन है कि शूद्रों और नारियों को क्यों बाहर रखा गया है? मनु के कार्यक्रम के अनुसार शूद्र और स्त्रियां केवल गृहस्थ ही रह सकते हैं। वे ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी क्यों नहीं हो सकते? यदि आश्रम-धर्म उन पर भी लागू कर दिया जाए तो उससे उन्हें अथवा समाज को क्या हानि हो सकती है?

आश्रम धर्म के संबंध में और भी पहेलियां हैं। पहली यह कि उन्होंने ब्रह्मचारियों ख्3, के संबंध में भेदभाव क्यों रखा?

अध्याय 2.41. कटि से ऊपर अपनी वर्ण व्यवस्थानुसार छात्र काले और चितकबरे मृग की छाल और बकरे की खाल वस्त्र के रूप में धारण करें और कटि के नीचे सन और भेड़ की ऊन के वस्त्र पहनें।

अध्याय 2.42. ब्राह्मण की मेखला में तीन गांठें हों जो मूंगा घास की मुलायम और चिकनी, क्षत्रिय की धनुष की तरह अर्धवृत्त में मुखाघास और वैश्य सन की बनी हो उसे धारण करें।

  1. सै.बु.ई. खंड 14, पृ. 40, अध्याय 7, श्लोक 1, 2, 3

  2. वही, खंड 2, पृ. 192, अध्याय 3, श्लोक 1, 2

  3. वही, खंड 2, मनु पृ. 37-9