परिशिष्ट-I: वर्णाश्रम धर्म की पहेली - Page 263

248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

व्यवस्था है। किसी व्यक्ति की आर्थिक और शारीरिक क्षमताओं को ध्यान में रखे बिना विवाह के लिए विवश करना दो व्यक्तियों का जीवन और राष्ट्र को नष्ट करने का मार्ग खोलता है। बशर्ते कि सरकार प्रत्येक व्यक्ति के निर्वाह का भरोसा दे। सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण है वानप्रस्थ और संन्यास। उनके संबंध में नियम इस प्रकार हैं। वानप्रस्थ ख्1, के लिए, निम्नांकित मनु व्यवस्था हैः

अध्याय 6.3. ग्राम्य आहार तथा वस्तुओं को छोड़कर, वन में जाने की इच्छा नहीं करने वाली अपनी पत्नी को पुत्रों के उत्तरदायित्व में सौंपकर अथवा वन में साथ जाने की इच्छा करने वाली अपनी पत्नी को साथ लेकर वन को जावे।

अध्याय 6.4. पवित्र अग्नि और घरेलू यज्ञ के उपकरण लेकर ग्राम से बाहर वन में जाकर जितेन्द्रिय होकर रहे।

अध्याय 6.5. पवित्र अनेकविध मुन्यन्न अथवा शाक, मूल और फल आदि से पूर्वोक्त पंचमहायज्ञों को विधिपूर्वक करता रहे।

अध्याय 6.6. मृग आदि का चर्म या पेड़ों का वल्कल धारण करे, सायंकाल तथा प्रातःकाल स्नान करे और सर्वदा जटा, दाढ़ी, मूंछ एवं नख को धारण करे।

अध्याय 6.7. जो भोज्य पदार्थ हो, उसी से बलि करे, भिक्षा दे और जलकन्द तथा फलों की भिक्षा देकर आये हुए अतिथियों का सत्कार करे।

अध्याय 6.8. सर्वदा वेदाभ्यास में लगा रहे, द्वंद्वों को सहन करे, सबसे मित्रभाव रखे, मन को वश मे रखे, दानशील बने, दान न ले और सब जीवों पर दया करे।

अध्याय 6.9. दर्श, पौर्णमास पर्वों को यथासमय त्याग नहीं करता हुआ विधिपूर्वक वैतानिक अग्निहोत्र करता रहे।

अध्याय 6.10. नक्षत्रेष्टि, आग्रहायण याग, चातुर्मास्य याग, उत्तरायण याग और दक्षिणायन याग को श्रोतस्मार्त विधि से क्रमशः करे।

अध्याय 6.11. वसन्त तथा शरद ऋतु में पैदा हुए एवं स्वयं लाये गये पवित्र मुन्यन्नों, पुरोडश तथा चरूको शास्त्रानुसार अलग-अलग तैयार करे।

अध्याय 6.12. वन में उत्पन्न अत्यंत पवित्र उस हविष्यान्न से देवों के उद्देश्य हवन कर बचे हुए अन्न का भोजन करे तथा स्वयं बनाये हुए लवण को काम में लाए।

अध्याय 6.13. भूमि तथा जल में उत्पन्न शाक को, वृक्षों के पवित्र पुष्प, मूल तथा फल को और फलों से बने स्नेह को भोजन करे।

  1. सै.बु.ई. खंड 30, पृ, 199-203