परिशिष्ट- I
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अध्याय 6.14. मधु, मांस, पृथ्वी में उत्पन्न छत्राक, भूस्तृण, शिग्रक और लसौडे का फूल का त्याग करे।
अध्याय 6.15. पूर्वसंचित मुन्यन्न, पुराने वस्त्र और शाक, कन्द एवं फल का आश्विन मास में त्याग कर दे।
अध्याय 6.16. वन में भी हल से जुती हुई भूमि में उत्पन्न खाद्य पदार्थ, चाहे किसी ने फेंक दिए हों, और कंद-मूल और फल को क्षुधा पीडि़त होकर भी न खाए।
अध्याय 6.17. अग्नि में पकाये हुए अन्नादि को खाने वाला बने, अथवा नियत समय पर पकने वाले पदार्थों को खाने वाला बने, अथवा वे पदार्थ जो पत्थर से पीस कर अथवा दांतों से चबाकर खाने वाले हों।
अध्याय 6.18. वह भोजन पात्रों को नित्य तुरंत साफ करने वाला बने, या एक मास का पर्याप्त प्रबंध करे अथवा इतना संग्रह करले जो छः माह या वर्ष पर्यन्त के लिए पर्याप्त हो।
अध्याय 6.19. यथाशक्ति खाद्य को लाकर सायंकाल या दिन में या एक दिन, पूरा उपवास कर दूसरे दिन, सायंकाल या तीन रात उपवास कर चौथे दिन सायंकाल भोजन करे।
अध्याय 6.20. अथवा शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष में चन्द्रायण के नियम से भोजन करे, अथवा अमावस्या तथा पूर्णिमा को दिन या रात्रि में केवल एक बार पकाई हुई ययागू का भोजन करे।
अध्याय 6.21. अथवा वैखानस आश्रम में रहने वाला सर्वदा केवल समय पर पके और स्वयं गिरे हुए फूल मूल और फलों से ही जीवन निर्वाह करे।
अध्याय 6.22. भूमि पर लेटै तथा टहले या पैर के अगले भाग पर दिन में कुछ समय तक खड़ा रहे या बैठा रहे, प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल में स्नान करे।
अध्याय 6.23. अपनी तपस्या को बढ़ाता हुआ ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि ले, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में रहे और शीत ऋतु में गीला कपड़ा धारण करे।
अध्याय 6.24. तीनों समय स्नान करता हुआ देवताओं, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण करे और कठोर तपस्या करता हुआ अपने शरीर को सुखा दे।
अध्याय 6.25. वानप्रस्थ के नियमानुसार वैतानिक अग्नि को आत्मा में रखकर वन में भी अग्नि और गृह का त्याग कर केवल मूल तथा फल का खावे।
अध्याय 6.26. सुख-साधक साधनों में उद्योग छोड़कर ब्रह्मचारी, भूमि पर सोने वाला, निवास स्थान में ममस्वरहित हो पेड़ों के मूल को घर समझ कर निवास